स्थायी रिकॉर्ड। मानव सभ्यता की शुरुआत अफ्रीका से हुई। इसलिए, संभावना है कि पैसे की शुरुआत भी वहीं से हुई होगी। जब इंसान छोटे समूहों में रहता था, तब हिसाब-किताब की जरूरत कम पड़ती थी। लेकिन जैसे-जैसे लोग आपस में व्यापार करने लगे, तो गिनती और भरोसे का सवाल खड़ा होने लगा। इशांगो हड्डी शायद वही जरूरत थी। पुरातत्वविदों की राय है कि स्थायी रिकॉर्ड रखने के लिए इसका उपयोग किया जाता होगा।
आग भी जरूरी। इंसानों के विकास में आग भी महत्वपूर्ण है। इंसान 4 लाख से अधिक वर्षों से आग का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी मानवविज्ञानी जेम्स सी. स्कॉट कहते हैं कि इंसान आग के अनुकूल प्रजाति है। आग के इस्तेमाल से हमारा शरीर बदला और जिन जानवरों के साथ हम रहते थे या जिनका शिकार करते थे, वे भी बदल गए। हम तब खानाबदोश थे, लेकिन आग की वजह से हम दूर-दूर तक जाकर शिकार और भोजन इकट्ठा कर पाने लगे। आग से हमने खाना पकाकर खाना सीखा, जिससे कम मेहनत में ज्यादा ऊर्जा मिली। इंसान को सोचने, योजना बनाने और समाज को व्यवस्थित करने का समय मिला। आग के पास बैठकर इंसान न केवल खाना खाता था, बल्कि बातचीत करता था, सौदे तय करता था और रिश्ते भी जोड़ता था।
अनाज से लेनदेन। इसके बाद 12,000 से 9,000 ईसा पूर्व के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण खेती की शुरुआत हुई। अनाज उगाना संभव हुआ, तो सुमेर जैसी सभ्यताओं में अनाज ही मुद्रा बन गई। प्राचीन सुमेर सभ्यता में अनाज खासकर जौ का पैसे की तरह इस्तेमाल होता था। एक शेकेल को जौ की तय मात्रा के बराबर माना जाता था, जिससे लेन-देन आसान था। हर शहर में अनाज का गोदाम सबसे महत्वपूर्ण संस्था होता था, जो केंद्रीय बैंक की तरह अनाज और पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता था। अच्छी फसल से अधिक अनाज और अधिक पैसा चलन में आता था। खेती से पैदा हुआ अतिरिक्त अनाज राज्य द्वारा टैक्स के रूप में लिया जाता था। पैसे का काम महज लेन-देन नहीं रहा, बल्कि समाज को चलाने का औजार बन गया।
भरोसे की कहानी। समाज के बढ़ने के साथ-साथ समस्याएं भी बढ़ने लगीं। इंसान जब शिकारी-संग्राहक था, तब वह छोटे समूह में रहता था। खेती से अतिरिक्त उपज ने शहरों को जन्म दिया, जहां बड़ी संख्या में लोग रहते थे। शहरों में एक व्यवस्था की जरूरत पड़ी और यहीं से पैसा सोशल टेक्नॉलजी बनने लगा। यह अजनबियों को भी साथ लाने का जरिया बन गया। इशांगो हड्डी से लेकर अनाज आधारित अर्थव्यवस्थाओं तक पैसे की कहानी दरअसल मानव संगठन, ऊर्जा और भरोसे की कहानी है। आज का डिजिटल युग भी उसी कहानी का अगला अध्याय है। QR कोड, UPI, ऑनलाइन बैंकिंग और ब्लॉकचेन, ये भरोसे को आसान बनाने की कोशिशें हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले निशान हड्डी पर बनते थे, फिर कागज पर बनने लगे और अब सब कुछ सर्वर पर आ गया है।













