सोची-समझी साजिश
22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले से पूरी दुनिया सन्न रह गई। इस नरसंहार के पीछे की मंशा लगभग तुरंत ही साफ हो गई थी। पीड़ित परिवारों से बातचीत के दौरान आतंकियों ने जो कहा, वह सीधे सरकार के लिए संदेश था। इससे यही संकेत मिला कि पहलगाम हमला एक सोची-समझी साजिश थी, ताकि भारत को सैन्य प्रतिक्रिया के लिए उकसाया जा सके।
मुनीर को फायदा
हालांकि, इस हमले के पीछे जो बड़ा खेल था, उससे पर्दा उठने में थोड़ा वक्त लगा। आज की परिस्थितियां देखें तो पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले और उस पर भारत के जवाब, इन दोनों से ही सबसे ज्यादा फायदा पाकिस्तानी सेना को मिला। उसके प्रमुख असीम मुनीर ने सरकार पर दबाव डालकर प्रमोशन ले लिया और फील्ड मार्शल बन गए। अब वही पाकिस्तान के वास्तविक शासक हैं। यह स्थिति दो साल पहले की तस्वीर से बिल्कुल उलट है, जब जनता की नजरों में पाकिस्तानी सेना की साख बिल्कुल निचले स्तर पर थी। तब इमरान खान की गिरफ्तारी के विरोध में लोग सेना के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे।
स्ट्राइक की ताकत
इस पूरे घटनाक्रम में भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि पाकिस्तानी सेना को जब लगता है कि वह देश के भीतर कमजोर पड़ रही है, तो अहमियत बढ़ाने के लिए वह दांव पर कुछ भी लगा सकती है – यहां तक कि युद्ध भी कर सकती है। इससे भी बड़ा सबक है कि पाकिस्तान की परमाणु हमले की गीदड़भभकी का जवाब देते हुए भारत सीधे वहां के सैन्य शक्ति केंद्रों को निशाना बना सकता है। भारी नुकसान के बाद भी पाकिस्तानी सेना जीत का ही दावा करेगी। उसका पूरा ध्यान होगा देश के भीतर नैरेटिव बनाने पर।
पाकिस्तान की गलतफहमी
भारत के पास अब ऐसी क्षमता है कि पाकिस्तान की जमीन पर कहीं भी मौजूद आतंकी ढांचे पर प्रभावी और बार-बार स्ट्राइक कर सके। 1998 में परमाणु क्षमता हासिल करने के बाद पड़ोसी देश को लगता था कि वह सुरक्षित हो चुका है, लेकिन उसकी यह गलतफहमी दूर हो चुकी है। ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के कई आतंकी ढांचे ध्वस्त हुए, पर इससे भी बड़ा हासिल वे सबक हैं, जिनके आधार पर भविष्य के लिए तैयारी शुरू हो चुकी है। भारत की पारंपरिक सैन्य क्षमता इतनी है कि वह पड़ोसी को कुछ ही दिनों में दबाव में ला सके।
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर
इस अभियान ने ब्रह्मोस, स्कैल्प और S-400 की अहमियत साबित की। आने वाले समय में ऐसे और हथियार देखने को मिलेंगे। स्वदेशी पर जोर है। वहीं, तमाम ड्रोन जैमिंग और स्पूफिंग की वजह से लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए। इस मामले में पाकिस्तान की हालत और खराब रही। इससे साफ हुआ कि मौजूदा ड्रोन तकनीक कमजोर है और देश की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता तेजी से मजबूत हो रही है।
इस ऑपरेशन की एक खास बात यह रही कि भारतीय रक्षा कंपनियां भी अभियान से जुड़ी थीं। कई स्वदेसी कंपनियों ने रियल टाइम में मोर्चे से ही सेना की मदद की। यह बदलाव रक्षा मंत्रालय के चार साल के प्रयासों का नतीजा है, जिसमें साथ मिलकर हथियारों के विकास और साथ मिलकर लड़ाई के मॉडल को अपनाया गया है।
नतीजों पर नजर
उद्योग जगत के स्तर पर सीख यह रही कि देश को स्वदेशी हथियारों के तेजी-से उत्पादन की जरूरत है। पहलगाम हमले के एक हफ्ते बाद नई दिल्ली में एक बैठक हुई थी, जिसमें भारतीय रक्षा उद्योग की क्षमता को आंका गया। यहां जो निष्कर्ष निकला, उसे रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। 2025 में नीतियों में बदलाव, सुधार, सेना-उद्योग के बीच तालमेल हुआ, तो 2026 में नतीजों पर नजर होगी। देखना होगा कि उद्योग जगत अपने वादों पर कितना खरा उतरता है।
समय की पाबंदी
सरकार चाहती है कि इंडस्ट्री जो वादा कर रही है, उसके प्रति जवाबदेह बने। देरी या गलती को कामकाज का हिस्सा मानकर छोड़ा नहीं जाएगा। आने वाले कुछ महीनों में सरकार कठोर उदाहरण पेश कर यह संदेश दे सकती है कि भारत के रक्षा उद्योग को अब ठीक से और समय पर काम करना होगा। नाकाम रहने वालों को साइडलाइन किया जा सकता है।















