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  • अमेरिका बनना चाहता है नई ईस्ट इंडिया कंपनी? मार्को रुबियो के भाषण से दुनिया में मची हलचल, यूरोप को बताई रेडलाइन

    वॉशिंगटन: अमेरिकी विदेश मंत्री ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में अपने भाषण में कई बातें कही हैं, जो दुनिया का ध्यान खींच रही हैं। रुबियो ने वेस्ट से फिर से मुकाबला करने और ग्लोबल साउथ की इकॉनमी में मार्केट शेयर जीतने के लिए कहा है। एक्सपर्ट ने इसे ट्रंप प्रशासन की ईस्ट इंडिया की तरह से


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    By Azad Hind Desk फरवरी 16, 2026
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    वॉशिंगटन: अमेरिकी विदेश मंत्री ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में अपने भाषण में कई बातें कही हैं, जो दुनिया का ध्यान खींच रही हैं। रुबियो ने वेस्ट से फिर से मुकाबला करने और ग्लोबल साउथ की इकॉनमी में मार्केट शेयर जीतने के लिए कहा है। एक्सपर्ट ने इसे ट्रंप प्रशासन की ईस्ट इंडिया की तरह से कॉलोनाइजेशन की कोशिश के तौर पर देखा है। एक्सपर्ट ने कहा है कि यह बयान 18वीं और 19वीं सदी में यूरोपियन ताकतों के मार्केट और कच्चे माल की रेस में एशिया और अफ्रीका को बांटकर अपनी कॉलोनी बनाने की याद दिलाता है।

    मार्को रुबियो ने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बात करते हुए इसे ‘नई वेस्टर्न सदी’ बनाने की बात कही है। रुबियो ने ट्रंप की यूरोप के लिए रेड लाइन बताते हुए कहा, ‘अमेरिका में हमें पश्चिम की मैनेज्ड गिरावट के विनम्र और व्यवस्थित रखवाले बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। हम सख्त बॉर्डर, इंडस्ट्री को फिर से शुरू करने और राष्ट्रीय संप्रभुता को फिर से लागू करने की मांग करते हैं। म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस फॉरेन और सिक्योरिटी पॉलिसी पर दुनिया के असरदार फोरम में एक है। 70 से ज्यादा देशों के सैकड़ों हेड ऑफ स्टेट, मिनिस्टर, मिलिट्री चीफ, डिप्लोमैट और पॉलिसी एक्सपर्ट इस मंच से ग्लोबल सिक्योरिटी चैलेंज पर बहस करते हैं।

    रुबियो के नजरिए ने चौंकाया

    रूबियो के नजरिए ने कई लोगों को सतर्क किया है क्योंकि ग्लोबल साउथ के बड़े हिस्से के कॉलोनी बनने के जख्म अभी ताजा हैं। इससे यह सवाल भी उठा है कि क्या ग्लोबल साउथ आर्थिक दबदबे के नए दौर का सामना कर रहा है। इसे सीधे अमेरिका लीड करना चाहता है। ग्लोबल साउथ से मतलब विकासशील देशों के ग्रुप से है, जो मुख्य रूप से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और ओशिनिया में है।

    रुबियो का बयान अमेरिकी आर्मी के वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को पकड़ने और देश के एनर्जी ट्रेड पर कंट्रोल करने के कुछ हफ्ते बाद आया है। 18वीं सदी में लंदन-बेस्ड ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह आज ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ग्लोबल ट्रेड पर हुक्म चलाने की कोशिश कर रहा है। हालिया महीनों में यह रवैया लगातार देखा गया है।

    क्या कहते हैं एक्सपर्ट

    जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि पहचान और सभ्यता की बहाली के नजरिए से पश्चिम के भविष्य को देखकर रुबियो ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के आइडेंटिटेरियन विचारों को इंटेलेक्चुअल रूप देने की कोशिश की है। यह वाइट सुप्रीमेसिस्ट बहस में पाए जाने वाले विषयों की याद दिलाती है।

    चेलानी ने एक्स पर लिखा, ‘रुबियो ने जो विजन बताया है, वह सिर्फ पावर का बैलेंस नहीं चाहता। यह एक ग्लोबल हायरार्की को फिर से बनाना चाहता है, जो स्वाभाविक रूप से कुछ अलग है और यूरोपियन साम्राज्यवाद (इंपीरियलिज्म) और वेस्टर्न हेजेमनी (दबदबा) के पुराने दौर की याद दिलाता है।’

    रुबियो जैसा भाषण नहीं सुना

    रुबियो के भाषण पर जियोपॉलिटिकल कमेंटेटर अर्नॉड बर्ट्रेंड ने कहा है, ‘यह सबसे ज्यादा इंपीरियलिस्ट भाषणों में से एक है, जो मैंने कभी किसी सीनियर अमेरिकी अधिकारी को देते देखा है। वह दुनिया भर में फैले बड़े साम्राज्यों को फिर से बनाना चाहते हैं।’

    जर्नलिस्ट जेसन जहरिस ने कहा कि रुबियो के भाषण से नहीं लगता है कि वेस्टर्न ब्लॉक सभ्य है या इंटरनेशनल लॉ और डेमोक्रेसी के सिद्धांतों को मानता है। लेखक-कमेंटेटर संजय बारू ने कहा है कि एंटी-कोलोनियलिज्म के प्रतीक के तौर पर भारत को रुबियो के भाषण की कड़ी आलोचना करनी चाहिए।

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