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  • अमेरिकी GM पशु चारा अब भारत में एंट्री को तैयार? यह चिंता का कारण क्यों रहा है

    नई दिल्ली: भारत-अमेरिका का ताजा फ्रेमवर्कअब शायद अमेरिकी जेनेटकली मॉडिफाइड पशु चारा उत्पादों के भारत में एंट्री का रास्ता साफ कर सकता है। भारतीय बाजारों के लिए अमेरिकी डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस विद सॉल्युबल्स (DDGS) कम से कम एक दशक से बहस का मुद्दा रहा है। यह राजनीतिक तौर पर भी बहुत संवेदनशील विषय है। जहां


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    By Azad Hind Desk फरवरी 9, 2026
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    नई दिल्ली: भारत-अमेरिका का ताजा फ्रेमवर्कअब शायद अमेरिकी जेनेटकली मॉडिफाइड पशु चारा उत्पादों के भारत में एंट्री का रास्ता साफ कर सकता है। भारतीय बाजारों के लिए अमेरिकी डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस विद सॉल्युबल्स (DDGS) कम से कम एक दशक से बहस का मुद्दा रहा है। यह राजनीतिक तौर पर भी बहुत संवेदनशील विषय है। जहां तक अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की बात है तो यह डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का एक अहम टॉपिक रहा है।

    जीएम पशु चारा पर एक दशक से चर्चा

    ET की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और अमेरिका के बीच जब भी मंत्रालयों के बीच आपसी चर्चा हुई है, डीडीजीएस का मुद्दा जरूर उठा है। भारत की सबसे बड़ी जेनेटकली मॉडिफिकिशेन से जुड़ी रेगुलेटरी काउंसिल, जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (GEAC) ने इसपर बार-बार अध्ययन भी किया है। पिछले एक दशक में इसपर कम से कम दो उप-समितियों ने भी गहराई से मंथन किया है। इन उपसमितियों ने क्या सलाह दिए हैं, यह बात तो सार्वजनिक नहीं है, लेकिनजीईएसी ने अपसे स्तर पर इनकी पड़ताल जरूर की है।

    जीएम सोयाबीन की डिमांड से विवाद शुरू

    2017 में ही जीईएसी ने माना था कि उसे देश भर से ऐसे कई आवेदन मिले हैं, जिसमें अमेरिकी डीडीजीएस के आयात की अनुमति मांगी गई है। इसके बाद ही यह इसके लिए ड्राफ्ट गाइडलाइंस बनाने में जुट गया। 2018 में इसे एक यह आवेदन भी मिला, जिसमें घोड़े का ऐसा चारा मंगवाने की गुजारिश थी, जिसमें जीएम सोयाबीन होता है, इसी के बाद जीएम का विवादित मुद्दा सामने आ गया।

    पॉल्ट्री फॉर्म के लिए जीएम सोयाबीन मांग

    थोड़ा ज्यादा पहले जाएं तो दिसंबर 2015 में ही एक पॉल्ट्री फार्म ने जीएम सोयाबीन मंगवाने का आवेदन जीईएसी के पास डाला था और इसके अलावा भी इसी तरह के कई आवेदन दिए गए थे। जून 2016 में जीईएसी ने एफएसएसएआई और पशुपालन विभागों से प्रतिक्रिया जानने के लिए कोई फैसला नहीं लिया। 2017 तक ऐसे आवेदनों के कतार लग गए, जिसमें अमेरिकी जीएम मक्के के आयात की मांग की गई थी। मार्च 2018 में जीईएसी ने उपसमितियों के सुझावों को मान लिया, लेकिन मंत्रालय की अनुमति के लिए मामला टल गया। बाद में एक गौड़ा समिति भी बनाई गई, जिससे जुलाई 2025 में जीईएसी ने अपने पिछले सुझावों को वैज्ञानिक आधार पर अपडेट करने को कहा, जिसे कि रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का हिस्सा बनाया जा सके।

    ज्यादा प्रोटीन और सस्ते विकल्प के लिए मांग

    इस दौरान जो चिंताएं उठाई गईं उनमें जानवरों के स्वास्थ्य, जानवरों के उत्पाद का इंसानों और पर्यावरण पर असर, जैसी बातें शामिल थीं। आखिरकार जुलाई 14, 2025 को जीईएसी ने कहा कि डीडीजीएस का जानवरों के स्वास्थ्य, परफॉर्मेंस और उत्पादों की गुणवत्ता के लिए चारा उद्योग में विस्तार से इस्तेमाल किया जाता है। पशुओं के चारे के लिए मक्के पर ज्यादा निर्भरता ने भारतीय उद्योग को डीडीजीएस और अल्फाल्फा घास आयात की मांग के लिए प्रेरित किया, क्योंकि ज्यादा प्रोटीन के लिए इसे सस्ता विकल्प माना जाता है।

    जीएम सरसों पर सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक

    जीईएसी ने अमेरिका से अल्फाल्फा घास आयात करने का रास्ता जुलाई 2024 में ही साफ कर दिया था। इसका आधार एफएसएसएआई की वैज्ञानिक समिति थी, जिसने इसे मवेशियों के लिए सुरक्षित चारा बताया था, लेकिन जेनेटिकली मॉडिफाइड से लिंक होने की वजह से यह कृषि मंत्रालय की अंतरिम मंजूरी के लिए अटका रह गया। इस तरह से जीएम की वजह से इस तरह का कोई भी चारा चिंता की वजह बनी रही। 2024 में ही सुप्रीम कोर्ट ने जीईएसी की जीएम सरसों की मंजूरी पर रोक लगा दी और एक राष्ट्रीय जीएम नीति पर जोर दिया, जो अभी तक तैयार नहीं हुई है।

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