वर्जीनिया पिएट्रोमार्की ने अल जजीरा में अपने लेख में कहा है कि ईरान में हजारों लोगों की गिरफ्तारी के बाद खामेनेई ने फिर से कंट्रोल हासिल कर लिया है। हालांकि इस ऊपरी शांति के बावजूद महंगाई और करेंसी में गिरावट की शिकायतें बनी हुई हैं, जो इस प्रदर्शन का वजह बनी थी। इससे निपटने के लिए ईरान के पास प्रतिबंधों में राहत पाने और अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए कड़े समझौते करने के अलावा कोई चारा नहीं है। कमजोर अर्थव्यवस्था, क्षेत्रीय सहयोगियों के कमजोर नेटवर्क और अमेरिकी हमले के बढ़ते खतरे के साथ ईरान एक चौराहे पर है।
ईरान को लेकर क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट
अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह में ईरान परियोजना के निदेशक अली वैज कहते हैं, ‘यह एक स्थिर स्थिति नहीं है। मैं यह भविष्यवाणी नहीं कर रहा हूं कि व्यवस्था जल्दी ही चरमरा जाएगी लेकिन यह साफ है कि देश एक भंवर में है। यह ऐसा भंवर है, जिसमें देश की स्थिति यह केवल नीचे ही जा सकती है। उसमें सुधार की कोई उम्मीद नहीं दिखती है।’
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों और कुप्रबंधन के कारण ईरानी रियाल का मूल्य बुरी तरह गिरा है और तेल राजस्व में कमी आई है। दरअसल 2016 में ईरान ने अमेरिका के साथ परमाणु गतिविधियों को सीमित करने के बदले प्रतिबंधों में ढील देने वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। डोनाल्ड ट्रंप ने इन प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिया। इसने ईरान का संकट बढ़ा दिया है।
प्रतिबंधों से राहत के लिए समझौता
कड़े प्रतिबंधों से राहत पाने के लिए ईरान को ट्रंप प्रशासन के साथ बातचीत की आवश्यकता है। इसके लिए ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को विदेश नीति पर कुछ रियायतें देनी होंगी। इनमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलें और क्षेत्रीय सहयोगियों का नेटवर्क शामिल है। ये ईरान की फॉरवर्ड डिफेंस रणनीति का हिस्सा हैं। खामेनेई ने पूर्व में सिर्फ परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने में दिलचस्पी दिखाई है।
ईरान के विश्लेषक और न्यूज साइट Amwaj.media के संपादक मोहम्मद अली शबानी कहते हैं, ‘यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान इन तीन तत्वों पर प्रतिबंधों को औपचारिक रूप से स्वीकार करने के लिए तैयार है या नहीं। ट्रंप ने ईरान में यूरेनियम संवर्धन फिर से शुरू करने पर फिर से बमबारी अभियान की धमकी दी है। ऐसे में खामेनेई अपने निर्णय लेने में असहज दिख रहे हैं।
क्षेत्रीय गुट भी हुए कमजोर
जर्मन अंतर्राष्ट्रीय और सुरक्षा मामलों संस्थान में विजिटिंग फेलो हलीरेजा अजीजी कहते हैं, ‘ईरान जून-2024 में इजरायल के साथ हुए युद्ध के बाद उस नेटवर्क को पुनर्गठित करने पर काम कर रहा है। इस युद्ध के बाद ईरान में बाहरी गुटों के साथ काम करने के वास्तविक लाभ पर भी बहस है। यह इसलिए क्योंकि लेबनान में हिजबुल्ला और गाजा में हमास कमजोर है। वहीं सीरिया में असद सरकार गिर गई है।
अजाजी कहते हैं कि फिलहाल ईरान का ध्यान इराक में छोटे समूहों के साथ काम करने, हिज़्बुल्लाह को हथियार स्थानांतरित करने के नए तरीके खोजने और यमन में हूतियों पर अधिक भरोसा करने पर ट्रांसफर हो गया है। ईरान ने क्षेत्र में सहयोगी गुट खड़े करने में आक्रामकता नहीं दिखाई है। इसके बावजूद हालिया विरोध प्रदर्शनों और अमेरिकी हमले के खतरे ने चीजों को बदल दिया है।
ईरान में बदलाव क्या अनिवार्य है?
ईरान और अमेरिका के बीच आसान नहीं लगती है। हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान ट्रंप ने ईरान पर हमले की धमकी दी, जिसने चीजों को खराब किया। अमेरिकी सेना के ईरान के पास जमावड़े ने भी संदेह पैदा किया है। हालांकि ट्रंप ने अपने बयानों से यह संकेत भी दिया है कि तेहरान से बातचीत के रास्ते खुले हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने दावोस में कहा कि ईरान बात करना चाहता है और हम बात करेंगे। उनकी टिप्पणियां ऐसे समय में आई, जब अमेरिका पश्चिम एशिया में जंगी बेड़ा भेज रहा है। दावोस के भाषण के एक दिन बाद ही ट्रंप ने यह भी कह दिया कि हम उस दिशा में एक विशाल बेड़ा भेज रहे हैं। शायद हमें उनका उपयोग नहीं करना पड़ेगा।
ईरानी लोगों का शासन से टूटता भरोसा
ईरान को समझौते करने पड़ते हैं तो वैधता की धारणा को बहाल करना मुश्किल हो जाएगा। वर्षों से ईरानी लोगों और व्यवस्था के बीच सामाजिक अनुबंध सुरक्षा की गारंटी पर आधारित रहा है। यह सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता की कीमत पर आता है। शबानी कहते हैं कि ईरान में शासन और समाज के बीच सामाजिक अनुबंध मुरझा रहा है। पिछले साल बिजली और पानी के संकट ने इसे बहुत कमजोर किया। ऐसे में मौजूदा शासन अपने अस्तित्व को बचाने की चुनौती का सामना कर रहा है।
अजीजी कहते हैं, ‘एक परिवर्तन पहले ही शुरू हो चुका है। राजनीतिक व्यवस्था मौलवी वर्ग से सैन्य नेतृत्व की ओर बढ़ रही है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) फिलहाल देश का सबसे शक्तिशाली आर्थिक और राजनीतिक संगठन बन गया है। ऐसे में 86 साल के खामेनेई की मौत या निष्कासन के बाद हम निश्चित ही तेहरान के शासन को उस रूप में नहीं देखेंगे, जैसा आज है। यह कैसा होगा, यह सवाल बरकरार है लेकिन परिवर्तन अनिवार्य है।’














