और समझता है। कभी कभी जीवन में जो घटनाएं घटती हैं, वे पिछले जन्मों का शाप और कर्मफल का परिणाम होती हैं, भले ही हम इसे मानें अथवा न मानें। पूर्वजन्म में श्री कृष्ण भगवान राम थे, बाली का भी पुनर्जन्म हुआ, जिसने कृष्ण को मारा। भगवान राम ने बाली को छुपकर मारा था, इसलिए बाली ने अपने अगले जन्म में कृष्ण के रूप में वही बदला चुकाया, जैसा कि धर्मग्रंथों में बताया गया है, जो कर्म के सिद्धांत को दर्शाता है।
मरते समय बाली ने श्रीरामचंद्र जी से कहा, ‘मैं बेकसूर था, मैंने आपका कुछ नहीं बिगाड़ा था। अब इसका हिसाब आपको अगले जन्म में देना पड़ेगा। ’गतिमान कालचक्र घूमता रहा। अगले जन्म में श्रीराम ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया और बाली भी पुनः जन्मा। महाभारत युद्ध के पश्चात एक दिन श्रीकृष्ण वन में विश्राम कर रहे थे। दूर से पूर्वजन्म के बाली रूपी शिकारी ने उनके चरणों को हिरण की आँख समझ लिया और भ्रमवश तीर चला दिया। तीर लगते ही वह पास आया और जब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ, तो भय और पश्चाताप से भरकर वह श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ा।
तब श्रीकृष्ण ने उसे पूर्वजन्म की कथा सुनाई और समझाया कि इसमें उसका कोई दोष नहीं था। यह तो कर्मों के ऋण की पूर्णता थी। जो बोया जाता है, वही काटना पड़ता है। कर्म का विधान अटल है, उससे कोई नहीं बच सकता। यहाँ तक कि स्वयं प्रभु के अवतार भी नहीं। इस प्रकार कर्मों का चक्र कर्मफल देकर ही पूरा होता है।














