भारत में शराब की खपत बढ़ने की वजह आर्थिक तरक्की है। शहरीकरण भी एक कारण है। फिर बदलते लाइफस्टाइल ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। मगर इसके दुखद पहलू भी हैं। 2019 में भारत में शराब की वजह से 3.40 लाख लोगों की जानें गई। ‘Why We Drink Too Much: The Impact of Alcohol on Our Bodies and Culture’ नाम की किताब में डॉक्टर चार्ल्स नोल्स ने बताया है कि शराब की लत क्यों पड़ती है
खुदकुशी के खयाल तक आने लगे
इसकी आदत छोड़ना आसान नहीं होता। इसे बताने के लिए उन्होंने निजी संदर्भो और पॉपुलर साइंस की मदद ली है। वह अपने बारे में लिखते हैं कि शराबखोरी की वजह से उनके वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता चला गया। वह अच्छे पिता भी नहीं रहे थे। बुरी तरह शराब पीने से उन्हें खुद का अहसास तक नहीं रहता था और खुदकुशी के खयाल तक आने लगे थे।
नुकसान नजरअंदाज नहीं कर सकते
निजी संदर्भों की वजह से यह किताब सिर्फ विषय के साइंटिफिक पहलुओं तक सीमित नहीं रह जाती। इस वजह से उनके लेखन में भावनात्मक पहलू भी जुड़ता है। इन संदर्भों को पढ़कर रीडर यह समझ सकता है कि शराब की लत कैसे किसी व्यक्ति के निजी जीवन पर बुरा असर डालती है और यह घर के अंदर और बाहर तनाव का कारण बन जाती है। कैसे इसकी लत आपको खुद को तबाह करने की ओर ले जाती है। चार्ल्स लिखते हैं कि शराब दुनिया का पसंदीदा ड्रग है। जश्न हो, सोशलाइजेशन हो या गम भुलाना हो, लोग इसका सहारा लेते हैं। इसलिए इससे होने वाले नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बताया- आदत क्यों पड़ जाती है
खैर, इस किताब में शराब छोड़ने का ज्ञान देने से चार्ल्स बचे हैं। यह बताने पर उनका अधिक जोर है कि इसका दिमाग और शरीर पर किस तरह से असर पड़ता है। वह यह भी बताते हैं कि अक्सर जो लोग सोशलाइजेशन के लिए शराब पीना शुरू करते हैं बाद में उन्हें इसकी आदत क्यों पड़ जाती है, क्यों शराब के बगैर उनका काम नहीं चलता। उन्होंने यह भी बताया है कि क्यों कुछ लोगों को शराब पीने में आनंद आता है और क्यों कुछ लोग इसे बिल्कुल पसंद नहीं करते। किताब में यह लिखा गया है कि इसके पीछे जेनेटिक्स, माहौल और ओढ़ी हुई उम्मीदें होती हैं।
बहुत अधिक शराब पीने का क्या कारण
चार्ल्स इसे समझाने के लिए न्यूरोसाइंस और epidemiology की मदद लेते हैं, लेकिन उन्होंने इसे ऐसी भाषा में लिखा है कि साइंस से अनजान रीडर भी इन्हें समझ सके। चार्ल्स ने किताब में पहले हुई रिसर्च का हवाला देते हुए बताया है कि जेनेटिक वेरिएंट्स का अल्कोहल मेटाबॉलिजम पर क्या असर होता है। फिर स्ट्रेस और सनसनी की चाहत किस तरह से शराब की इच्छा पैदा करते हैं। यानी जो लोग बहुत अधिक शराब पीते हैं, उसका कोई एक कारण नहीं होता।
मॉडर्न कल्चर से मिला बढ़ावा
चार्ल्स यह भी बताते हैं कि किस तरह से मॉडर्न कल्चर शराबखोरी को बढ़ावा देता है, जैसे- दफ्तर के आयोजन हों या जश्न का कोई भी मौका । किताब में यह भी लिखा गया है कि किस तरह से विज्ञापन की दुनिया इसका लाभ उठाती है। चार्ल्स शराब पर प्रतिबंध के हिमायती नहीं हैं। न ही वह 30 दिनों में शराब की लत से छुटकारा दिलाने का दावा करते हैं। हां, उन्होंने ऐसे तथ्य जरूर पेश किए हैं, जिन्हें पढ़कर रीडर खुद सोचने मजबूर हो जाए कि शराब के साथ उसका रिश्ता कैसा है।














