फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, खालिस्तानी तत्वों की कनाडा, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में उपस्थिति पहले ही भारत की चिंता बढ़ाता रहा है। भारत के पंजाब को सिखों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग करने वाले आंदोलन ने अब अजरबैजान में दस्तक दी है। अजरबैजान की इस कॉन्फ्रेंस के भारत के लिए खतरनाक नतीजे हो सकते हैं। खासतौर से पाकिस्तान और तुर्की का पहलू दिल्ली की चिंता बढ़ाता है। बाकू में हुआ यह सम्मेलन पाकिस्तान के भारत-विरोधी नैरेटिव में फिट होता है।
बाकू में खालिस्तान का आयोजन
अजरबैजान की राजधानी बाकू में 16 जनवरी को सरकार से जुड़े इनिशिएटिव ग्रुप ने भारत में अल्पसंख्यक समुदायों के साथ व्यवहार पर अपना पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया। ‘भारत में सिखों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नस्लवाद और हिंसा: जमीनी हकीकत’ नाम के इस कार्यक्रम में पाकिस्तानी पंजाब के अल्पसंख्यक मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा के साथ कनाडा, यूके और अमेरिका के प्रतिनिधि शामिल हुए।
इस सम्मेलन में शामिल होने वालों में खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर का दोस्त मोनिंदर सिंह भी था। इसके अलावा यूके से खालिस्तानी बिंदरजीत सिंह सिद्धू यहां आया। अजरबैजान में हुए कार्यक्रम को लेकर सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि 2023 में कनाडा में मारे गए खालिस्तानी हरदीप सिंह निज्जर की याद में मौन रखा गया। कार्यक्रम में खासतौर से भारत की सरकार वक्ताओं के निशाने पर रही।
भारत के लिए क्यों चिंता का सबब
अजरबैजान की राजधानी में हुए इस सम्मेलन में खालिस्तान आंदोलन को वैधता दिलाने की पुरजोर कोशिश की गई। बैठक की रणनीति क्षेत्रीय बातों से आगे बढ़कर इस आंदोलन को संयुक्त राष्ट्र (UN) तक पहुंचाना था। अजरबैजान में यह आयोजन पाकिस्तान और तुर्की के भारत-विरोधी नैरेटिव के साथ उसके जुड़ाव को दर्शाता है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की कोशिश अजरबैजान का इस्तेमाल निष्पक्ष दिखने वाले मंच के तौर पर करने की है। यह कार्यक्रम भारत विरोधी तत्वों को एक ‘निष्पक्ष’ मंच देने के लिए किया गया है। इसके जरिए इस्लामाबाद भारत-विरोधी तत्वों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रखते हुए खुद को इससे दूर दिखा सकता है।
पाकिस्तान-तुर्की-अजरबैजान का गठजोड़
बाकू में हुआ खालिस्तान सम्मेलन पाकिस्तान, तुर्की और अजरबैजान के बीच बढ़ते गठजोड़ का संकेत है। अजरबैजान हाल के दिनों में पाकिस्तान का पक्ष लेता रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण पिछले साल का ऑपरेशन सिंदूर था। अजरबैजान ने पाकिस्तान के रुख का समर्थन करते हुए भारत के खिलाफ अपना बयान दिया था।
अजरबैजान का पाकिस्तान को समर्थन नई दिल्ली की ओर से आर्मेनिया को दिए जा रहे हथियारों की वजह से है। 2024 में अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने भारत से आर्मेनिया को रक्षा उपकरण की आपूर्ति से दूर रहने को कहा था। अजरबैजान की राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए उन्होंने भारत की आलोचना की थी।
अजरबैजान ने कश्मीर मुद्दे पर वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान का समर्थन किया है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार कश्मीर का मुद्दा उठाया है। उसी तरह का रुख अब अजरबैजान का है। ऐसे में भारत के लिए इन तीन देशों को गठजोड़ निश्चित तौर पर चिंता को बढ़ाता है।













