इस डील से ताइवान की टेक्नोलॉजी में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग गहरा होगा। ताइवानी कंपनियां खास तौर पर सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में 250 अरब डॉलर का निवेश करेंगी। इस सौदे में कुछ आयातित सामानों को टैक्स से छूट भी मिलेगी, जैसे कि जेनेरिक दवाएं और हवाई जहाज के पुर्जे। जो ताइवानी सेमीकंडक्टर कंपनियां अमेरिका में निवेश करेंगी, उन्हें टैक्स में खास छूट मिलेगी। इस डील का असर भारत पर दिखाई दे सकता है। साथ ही इस डील के होने पर चीन ने भी नाराजगी जताई है।
India EU Trade Deal: चीन उठा सकता है फायदा… भारत और ईयू के बीच ट्रेड डील से पहले BMW की कैसी चेतावनी?
क्या दुनिया में बदलेगी तकनीक दुनिया?
ताइवान की सरकार ने पुष्टि की है कि उसकी कंपनियां सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एप्लीकेशन और ऊर्जा जैसे अमेरिकी उद्योगों में सीधे 250 अरब डॉलर का निवेश करेंगी। इसके अलावा, ताइवान विदेशी निवेश का समर्थन करने के लिए 250 अरब डॉलर की क्रेडिट गारंटी भी प्रदान करेगा।
अमेरिका और ताइवान के बीच हुई डील दुनियाभर में टेक्नोलॉजी के भविष्य को बदल सकती है। इस समझौते का मुख्य कारण 500 अरब डॉलर का बड़ा निवेश है, जिसका लक्ष्य अमेरिकी टेक इंडस्ट्री, खासकर कंप्यूटर चिप्स को मजबूत करना है। ये चिप्स स्मार्टफोन, कार से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तक हर चीज को पावर देते हैं।
अमेरिका को क्या फायदा?
यह समझौता अमेरिका में सेमीकंडक्टर (चिप बनाने वाले) इंडस्ट्री को वापस लाएगा। यह अमेरिका में विश्व स्तरीय औद्योगिक पार्क बनाने के लिए एक ‘आर्थिक साझेदारी’ स्थापित करेगा। इसका मतलब है कि चिप बनाने का काम दशकों बाद फिर से अमेरिका में होगा, जो अब तक ज्यादातर विदेशों में होता रहा है। जो ताइवानी सेमीकंडक्टर कंपनियां अमेरिका में निवेश करेंगी, उन्हें टैक्स में खास छूट मिलेगी। इससे चिप निर्माताओं के लिए अमेरिका में कारखाने स्थापित करना और उनका विस्तार करना सस्ता और तेज हो जाएगा।
भारत को क्या नुकसान?
वहीं भारत की बात करें तो इस डील से कुछ झटका लग सकता है। भारत अपनी पहली ‘मेड इन इंडिया’ चिप का तेजी से विस्तार करने पर लगा है। चिप सेक्टर में तेजी के लिए भारत सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM), सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम और PLI योजनाएं शुरू की हैं। विक्रम-3201 जैसी स्वदेशी चिप्स बन चुकी हैं और साल 2030 तक बाजार 110 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इससे देश डिजिटल इंडिया के लिए एक प्रमुख चिप हब बनकर उभरेगा। अमेरिका और ताइवान के बीच डील से काफी चिप कंपनियां अमेरिका का रुख कर सकती हैं। भारत को इससे कुछ नुकसान हो सकता है।
चीन ने जताई नाराजगी
चीन ने अमेरिका और ताइवान के बीच हुई इस ट्रेड डील का कड़ा विरोध किया है। इस समझौते का मकसद ताइवान के उत्पादों पर लगने वाले टैक्स को कम करना और अमेरिका में ताइवान के निवेश को बढ़ाना है। चीन ने अमेरिका से ‘एक-चीन सिद्धांत’ का पालन करने का आग्रह किया। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। बीजिंग ने इस समझौते की घोषणा से पहले ही इसकी आलोचना की थी। उन्होंने इसे अमेरिका द्वारा ताइवान पर ‘आर्थिक लूट’ बताया था।













