पाकिस्तान के लिए मुश्किल चक्रव्यूह
दरअसल पाकिस्तान इस समय एक जटिल भू-राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसा हुआ दिखाई दे रहा है,जहां चीन,अमेरिका, सऊदी अरब और क्षेत्रीय परिदृश्य की अलग-अलग अपेक्षाओं ने उसकी नीति निर्माण को उलझा दिया है। गाजा संकट में सेना न भेजना,सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग,यमन प्रश्न पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में विरोध, बलूचिस्तान में चीन के हित तथा अमेरिकी प्रभाव की संभावित पैठ के बीच पाकिस्तान के लिए संतुलन साधना कठिन हो गया है। यदि गाजा संकट पर अमेरिका के रुख और पाकिस्तान की सैन्य दूरी के कारण वाशिंगटन इस्लामाबाद से असंतुष्ट होता है तो यह पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक दबाव और आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है। ऐसे में भारत का अमेरिका के साथ रणनीतिक तालमेल,रक्षा सहयोग,प्रौद्योगिकी साझेदारी और इंडो-पैसिफिक रणनीति के सम्बन्ध मजबूती की राह पर लौट आने की पूर्ण उम्मीद बनेगी। अमेरिका के लिए एक विश्वसनीय,स्थिर,लोकतांत्रिक और आर्थिक रूप से सक्षम साझेदार की आवश्यकता भारत की प्रासंगिकता को बढ़ाती है।
अमेरिका-चीन में फंसा पाकिस्तान
सऊदी अरब से पाकिस्तान का रक्षा सहयोग एक दोधारी तलवार है। यमन को लेकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच अंतर्विरोध पाकिस्तान को असहज कर रहा है क्योंकि वह दोनों ही खाड़ी देशों पर आर्थिक निर्भरता रखता है। इस परिस्थिति में भारत के लिए खाड़ी देशों के साथ अपनी सामरिक,आर्थिक और ऊर्जा साझेदारी को और गहरा करने का अवसर मौजूद है। भारतीय श्रमिक, व्यापार,निवेश और सुरक्षा सहयोग के माध्यम से भारत खाड़ी में अपनी विश्वसनीयता बढ़ा सकता है। चीन के लिए सीपैक और ग्वादर बंदरगाह उसकी वैश्विक रणनीति के अहम पड़ाव हैं। यदि बलूचिस्तान में पाकिस्तान अमेरिकी प्रभाव या किसी अमेरिकी कंपनी की भागीदारी को स्वीकार करता है तो यह चीन-पाक संबंधों में तनाव ला सकता है। चीन की चिंताओं के बढ़ने का अर्थ है कि पाकिस्तान पर उसका दबाव बढ़ेगा,जो आंतरिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है। भारत इस स्थिति में प्रत्यक्ष दखल की बजाय कूटनीतिक सतर्कता और क्षेत्रीय स्थिरता की नीति से लाभ उठा सकता है।
भारत के लिए बदलेगी स्थिति
2025 में डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने भारत की कूटनीतिक चुनौतियों को निश्चित रूप से जटिल बनाया था। अमेरिका फर्स्ट,व्यापारिक संरक्षणवाद, अप्रत्याशित कूटनीतिक रवैया और दक्षिण एशिया में संतुलन नीति से हटकर दबाव आधारित रणनीतियों ने भारत को कई मोर्चों पर सावधानीपूर्वक संतुलन साधने के लिए मजबूर किया था। 2026 में यह स्थिति बदलती दिख सकती है। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार अमेरिका के लिए निर्णायक आकर्षण है। ट्रम्प के लिए घरेलू अर्थव्यवस्था,रोजगार और निर्यात हित सर्वोपरि रहते हैं। ऐसे में भारत के साथ गहरे आर्थिक,निवेश और तकनीकी संबंध अमेरिका के हित में भी होंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स,रक्षा उपकरण,ऊर्जा सहयोग,डिजिटल टेक्नोलॉजी तथा विनिर्माण क्षेत्र में अमेरिका अपनी कंपनियों के लिए बड़े अवसर देखता है। चीन पर निर्भरता कम करने की नीति के तहत अमेरिकी कंपनियों के लिए चाइना प्लस वन का स्वाभाविक विकल्प भारत बन सकता है। इस प्रकार आर्थिक हित ही ट्रम्प नीति को भारत के अनुकूल दिशा देने के प्रमुख कारकों में से एक होंगे।
बांग्लादेश में भी बदल रहे हालात
बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता और वहां के वस्त्र उद्योग का कमजोर पड़ना है। वैश्विक टेक्सटाइल व परिधान सप्लाई चेन में बांग्लादेश की केंद्रीय भूमिका रही है। यदि अस्थिरता और औद्योगिक संकट गहराता है तो अमेरिका और पश्चिमी बाजारों के लिए विश्वसनीय वैकल्पिक आपूर्ति केंद्र की आवश्यकता बढ़ेगी। भारत इस स्थिति में बड़ा और भरोसेमंद उत्पादन केंद्र बन सकता है। इससे अमेरिका और भारत की आर्थिक साझेदारी मजबूत होगी और ट्रम्प प्रशासन भारत की स्थिरता और आर्थिक क्षमता को रणनीतिक सहयोग के रूप में देखेगा। रूस और चीन की निकटता अमेरिका के लिए रणनीतिक चुनौती बनी हुई है। यदि पाकिस्तान चीन के साथ अपनी निर्भरता और बढ़ाता है या चीन को दक्षिण एशिया,हिंद महासागर और मध्य एशिया में मजबूत पकड़ मिलती है तो ट्रम्प प्रशासन संतुलन के लिए भारत को स्वाभाविक साझेदार के रूप में उपयोग करेगा। भारत रूस के साथ भी ऐतिहासिक संबंध रखता है और वैश्विक बहुध्रुवीयता का समर्थक है। इसीलिए भारत अमेरिका के लिए एक संतुलित, विश्वसनीय और स्वतंत्र शक्ति है जो न अमेरिकी विरोधी किसी ब्लॉक का हिस्सा है और न ही चीन के प्रभाव में है।
दक्षिण एशिया में भारत रहेगा अहम
2026 में बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरण ट्रम्प प्रशासन को भारत के साथ अधिक समन्वित,हित-आधारित और सकारात्मक नीति की ओर आगे बढ़ने को प्रेरित कर सकते हैं। 2026 दक्षिण एशियाई राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस वर्ष बांग्लादेश,नेपाल और म्यांमार में आम चुनाव होंगे। इन तीनों देशों की राजनीतिक स्थिरता,सत्ता संरचना और विदेश नीति का सीधा प्रभाव भारत की सुरक्षा,अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय संतुलन और कूटनीतिक प्रभावशीलता पर पड़ेगा। बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता,सत्ता संघर्ष,आर्थिक दबाव और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का हस्तक्षेप उसकी नीतियों को अस्थिर कर रहा है। यदि 2026 के चुनाव के बाद स्थिर और भारत के लिए मुफीद सरकार बनती है तो दक्षिण एशिया में संतुलन मजबूत होगा,आतंकवाद और कट्टरवाद के खतरे कम होंगे तथा व्यापार तथा सुरक्षा सहयोग बढ़ेगा। इसके विपरीत यदि सत्ता परिवर्तन के साथ अस्थिरता बढ़ती है तो भारत की पूर्वी सीमा,शरणार्थी दबाव और सुरक्षा चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
नेपाल और म्यांमार में स्थिति
नेपाल के चुनाव भी भारत की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। नेपाल में चीन की बढ़ती सक्रियता,राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की अनिश्चितता भारत के लिए हमेशा कूटनीतिक चुनौती रही है। 2026 यह तय करेगा कि नेपाल किस हद तक भारत केंद्रित संतुलित नीति अपनाता है या चीन-पक्षीय रुख को गहराता है। म्यांमार की स्थिति और जटिल है। सैन्य शासन,गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियां,शरणार्थी संकट और सीमावर्ती सुरक्षा चुनौतियां भारत को लगातार प्रभावित कर रही हैं। 2026 के चुनाव यदि स्थिर राजनीतिक व्यवस्था की दिशा में रास्ता खोलते हैं तो भारत के पूर्वोत्तर की सुरक्षा,सीमा प्रबंधन, कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट और एक्ट ईस्ट पॉलिसी को ताकत मिलेगी। इस प्रकार यदि दक्षिण एशिया के प्रमुख देशों में स्थिर और सहयोगी सरकारें बनती हैं तो क्षेत्रीय एकीकरण,आर्थिक साझेदारी,ऊर्जा सहयोग,संपर्क परियोजनाएं और आतंकवाद विरोधी ढांचा मजबूत हो सकता है। भारत के लिए यह अवसर होगा कि वह नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए दक्षिण एशिया को सहयोगात्मक विकास के मॉडल की ओर ले जाए।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं।)














