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  • बहस और असहमति स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा, जेएनयू में बोले उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

    नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वाद-विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं। हालांकि, ऐसी प्रक्रियाओं का अंततः एक निष्कर्ष पर पहुंचना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि फैसला हो जाने के बाद उसके कार्यान्वयन में सहयोग करने


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    By Azad Hind Desk जनवरी 13, 2026
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    नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वाद-विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं। हालांकि, ऐसी प्रक्रियाओं का अंततः एक निष्कर्ष पर पहुंचना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि फैसला हो जाने के बाद उसके कार्यान्वयन में सहयोग करने की सामूहिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए।

    जेएनयू में सीपी राधाकृष्णन ने क्या कहा

    दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नौवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने ये बात कही है। उन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल करने वाले छात्रों से अपने ज्ञान और कौशल को राष्ट्र सेवा में समर्पित करने का आग्रह किया। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर उनके उपदेशों को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा को डिग्री से आगे बढ़कर चरित्र निर्माण, बौद्धिक क्षमता में वृद्धि और व्यक्तियों के सशक्तिकरण पर जोर देना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।

    पीएम मोदी के विकसित भारत प्लान का जिक्र

    राधाकृष्णन ने इस बात पर जोर दिया कि केवल शिक्षा और उचित प्रशिक्षण ही भारत के युवाओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने में सक्षम बनाएगा। भारत में ज्ञान की सभ्यतागत परंपरा को रेखांकित करते हुए राधाकृष्णन ने नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख किया।

    उपनिषदों और भगवद् गीता, कौटिल्य पर कही ये बात

    सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि उपनिषदों और भगवद् गीता से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल तक, भारतीय धर्मग्रंथों और शास्त्रों ने निरंतर शिक्षा को सामाजिक और नैतिक जीवन के केंद्र में रखा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सच्ची शिक्षा आचरण और चरित्र का निर्माण करती है, और यह केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं है।

    जेएनयू के लोकतांत्रिक लोकाचार का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि वाद-विवाद, चर्चा, असहमति और यहां तक कि टकराव भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसी प्रक्रियाओं का अंततः एक निष्कर्ष पर पहुंचना आवश्यक है।

    ग्रेजुएट्स से 3 अहम जिम्मेदारियों की अपील

    उपराष्ट्रपति ने ग्रेजुएट्स से तीन प्रमुख जिम्मेदारियों का पालन करने का आग्रह किया – सत्य की तलाश में बौद्धिक ईमानदारी, असमानताओं को कम करने के लिए सामाजिक समावेश और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान। उन्होंने उनसे संवैधानिक मूल्यों और भारत की सभ्यतागत नैतिकता से निर्देशित होने और हमेशा अपने माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान करने का आह्वान किया।

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