गीता गोपीनाथ का कहना है कि भारत के आर्थिक विकास के लिए टैरिफ से कहीं ज्यादा खतरनाक प्रदूषण है। उन्होंने कहा कि इसे देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता के तौर पर निपटाना चाहिए। यह बात उन्होंने वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम, दावोस में भारतीय अर्थव्यवस्था पर चर्चा के दौरान कही। गोपीनाथ ने बताया कि व्यापार बढ़ाने की चर्चाओं में अक्सर व्यापारिक बाधाओं और नियमों पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन प्रदूषण के आर्थिक असर को कम करके आंका जाता है।
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प्रदूषण को बताया चुनौती
उन्होंने कहा, ‘मैं एक ऐसी बात बताना चाहती हूं जिस पर हम आमतौर पर व्यापार बढ़ाने की बात करते समय चर्चा नहीं करते। प्रदूषण भारत में एक चुनौती है और अगर आप भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रदूषण के असर को देखें, तो यह अब तक भारत पर लगाए गए किसी भी टैरिफ के असर से कहीं ज्यादा गंभीर है।’
साल 2022 में जारी एक वर्ल्ड बैंक की स्टडी का हवाला देते हुए गोपीनाथ ने बताया कि भारत में हर साल प्रदूषण के कारण लगभग 17 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यह देश में होने वाली कुल मौतों का करीब 18 प्रतिशत है। उन्होंने कहा, ‘अगर आप भारत में प्रदूषण के स्तर के कारण जीडीपी पर पड़ने वाले सालाना खर्च को देखें, तो यह सिर्फ आर्थिक गतिविधियों पर असर नहीं है, बल्कि जानों का नुकसान भी है। ये आंकड़े वाकई बहुत बड़े हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि इसका असर परिवारों, काम करने की क्षमता और लंबे समय के विकास पर भी पड़ता है।
निवेशकों का भरोसा दांव पर
हार्वर्ड की अर्थशास्त्र की प्रोफेसर गोपीनाथ ने यह भी कहा कि प्रदूषण भारत को निवेश के लिए एक आकर्षक जगह बनाने में भी बाधा डालता है। उन्होंने कहा कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय निवेशक के नजरिए से अगर वे भारत में अपना काम शुरू करने के बारे में सोच रहे हैं और उन्हें वहीं रहना है। अगर वहां का माहौल ऐसा नहीं है कि उन्हें लगे कि यह उनके स्वास्थ्य के लिए ठीक रहेगा, तो वे पीछे हट जाते हैं।
‘युद्ध स्तर’ पर निपटाया जाना जरूरी
प्रदूषण के मुद्दे की गंभीरता पर जोर देते हुए गोपीनाथ ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण को ‘युद्ध स्तर’ पर निपटाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह भारत के लिए एक शीर्ष मिशन होना चाहिए। उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण को डीरेग्युलेशन (नियमों को आसान बनाना) के साथ एक ऐसे प्रमुख क्षेत्र के रूप में रखा जिस पर तत्काल नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है।













