पाकिस्तान लड़ रहा 1971 की लड़ाई
पाकिस्तान 1971 की हार अभी तक भूला नहीं है और एक बार वह फिर से उस लड़ाई को शुरू कर चुका है। अवामी लीग के बैन होने और जमात-ए-इस्लामी और दूसरे इस्लामिक समूहों के उभार ने पाकिस्तान को एक बार फिर बांग्लादेश में जमीन दे दी है। अब वह बांग्लादेश में अपना नैरेटिव सेट कर रहा है और नाम से नहीं तो कम से कम भावना के स्तर उसे एक बार फिर से पूर्वी पाकिस्तान बनाने की कोशिश में लगा है।
पाकिस्तान को मिला तुर्की का साथ
अगर पाकिस्तान को रोका न गया तो उसका रवैया और खराब होता जाएगा। वह बांग्लादेश में जो कर रहा है, वह भारत के लिए रेड लाइन का उल्लंघन होना चाहिए। पाकिस्तान इसमें अकेला नहीं है। तुर्की, सऊदी अरब और कतर के मिलिट्री और आर्थिक सपोर्ट से इस्लामाबाद के हौसले बुलंद हैं। इन सबके अलावा इस्लामाबाद का पक्का दोस्त चीन भी है, जो भारत को हर हाल में कमजोर होते देखना चाहता है। चीन खुद सामने आकर यह काम नहीं करना चाहता है, ऐसे में पाकिस्तान इस्तेमाल करने के लिए सबसे सही है।
संडे गार्डियन में अपने लेख में एक्सपर्ट माइकल रुबिन ने पाकिस्तान को एक जहरीला खंजर बताया है, जिसके इस्तेमाल अलग-अलग देश भारत को लड़खड़ाने और उस पर ग्रे जोन वॉर छेड़ने के लिए करते हैं। रुबिन का कहना है कि अगर भारत जवाब नहीं देता है, तो वह अपनी पहली और सबसे बड़ी लड़ाई हार सकता है।
भारत के खिलाफ पाकिस्तान की चाल
माइकल रुबिन एक दोहरे खतरे की तरफ आगाह करते हैं। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान एक तरफ अलगाववाद फैलाता है, जबकि तुर्की और कतर के साथ मिलकर वह भारत के 20 करोड़ से ज्यादा मुसलमानों को भड़काने की कोशिश करता है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का अपना एजेंडा है। वह फिर से ऑटोमन खलीफा के दौर की वापसी के सपने देखते हैं। एर्दोगन ऐसे किसी भी ऑर्डर को स्वीकार नहीं कर सकते, जिसमें गैर-मुस्लिम मुसलमानों पर चुनावी पावर का इस्तेमाल करें।
भारत को देना होगा जवाब
रुबिन का कहना है कि भारत को अब पाकिस्तान के खिलाफ मुहिम तेज करनी चाहिए। पाकिस्तान का बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांत हिंसा की आग में चल रहे हैं। बलूचिस्तान ने तो पाकिस्तान से आजादी के लिए जंग ही छेड़ रखी है, वहीं खैबर पख्तूनख्वा के सीमावर्ती इलाके चरमपंथ की चपेट में हैं। भारत को पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों के सही प्रतिनिधियों को आवाज और मंच देना चाहिए। इसी तरह तुर्की को भी जवाब देना चाहिए। तुर्की भारतीय मुसलमानों को स्कॉलरशिप देता है और उन्हें इस्लामिस्ट ढांचे में ढालने की कोशिश करता है। भारत को भी कुर्द छात्रों का स्वागत करके जवाब देना चाहिए, जो तुर्की के दमनात्मक रवैये का मुकाबला कर रहे हैं।













