प्रेस रिलीज में हेग स्थित मध्यस्थता कोर्ट ने कहा है कि “उसने इंडस वाटर्स ट्रीटी के आर्टिकल IX और एनेक्सर G के तहत पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ शुरू किए गए आर्बिट्रेशन में मेरिट्स पर दूसरे फेज की सुनवाई 3 फरवरी को पूरी कर ली।” इसमें कहा गया, “भारत ने सुनवाई में भाग लेने के न्योते का जवाब नहीं दिया और पेश नहीं हुआ।” आपको बता दें सिंधु जल संधि पर वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता में 1960 में भारत-पाकिस्तान के बीच समझौता हुआ था, जिसे भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद सस्पेंड कर दिया है।
हेग स्थित मध्यस्थता कोर्ट में क्यों पेश नहीं हो रहा भारत
पाकिस्तान, सिंधु बेसिन की नदियों पर भारत के हाइड्रोइलेक्ट्रिक डिजाइन और प्रोजेक्ट्स का विरोध कर रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि नई दिल्ली ने शेयर्ड वॉटर रिसोर्स से जुड़ी ट्रीटी के तहत तय लिमिट को पार कर लिया है। भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद से पाकिस्तान को नदियों के बारे में जानकारियां देनी बंद कर दी हैं। वहीं, भारत ने चिनाब नदी पर सावलकोट हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट शुरू किया है। केन्द्र सरकार ने प्रोजेक्ट्स से जुड़े अधिकारियों को जल्द से जल्द पूरा करने का निर्देश दिया है। इसलीए प्रोजेक्ट का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। पाकिस्तान इससे परेशान है।
पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्रालय के टॉप सूत्रों के हवाले से न्यूज 18 ने एक दिन पहले दावा किया है कि पाकिस्तान, जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर भारत के नए डैम का रिव्यू कर रहा है। भारत का ये प्रोजेक्ट करीब 5,129 करोड़ रुपये का है। मोदी सरकार ने पिछले साल ही इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी थी। वहीं, भारत किसी भी ‘मध्यस्थता अदालत’ को मान्यता ही नहीं देता है, इसीलिए भारत के पेश होने का कोई सवाल ही नहीं है। भारत ने ‘कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ की वैधता पर आपत्ति जताई है।
मध्यस्थता कोर्ट में सुनवाई के दौरान क्या हुआ है
प्रेस रिलीज के मुताबिक कोर्ट ने पाकिस्तान की तरफ से शुरू की गई ‘दूसरे चरण’ की सुनवाई पूरी कर ली है। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत की किशनगंगा और रैटल जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन संधि का उल्लंघन करते हैं। वहीं कोर्ट ने नोट किया है कि भारत को बार-बार न्योता दिया जा रहा है, लेकिन भारत इसमें भाग नहीं लेता है। कोर्ट ने कहा है कि भारत के शामिल न होने के बावजूद सुनवाई जारी रहेगी। कोर्ट ने इससे पहले भारत को किशनगंगा और बगलिहार प्रोजेक्ट्स से जुड़े तकनीकी और ऑपरेशनल डेटा जमा करने का निर्देश दिया था, जिसकी समयसीमा 9 फरवरी 2026 थी। लेकिन भारत ने कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया।
भारत, कोर्ट की कार्रवाई को अवैध मानता है और इसके पीछे भारत का कहना है कि यह ‘मध्यस्थता अदालत’ (Court of Arbitration) अवैध रूप से गठित है और संधि के नियमों के खिलाफ है। भारत सिर्फ ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ की प्रक्रिया को ही कानूनी मानता है। भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान, सीमा पार आतंकवाद बंद नहीं करता, तब तक संधि पर सामान्य चर्चा संभव नहीं है। भारत ने साफ कर दिया है कि वो कोर्ट को फैसला न मानने के लिए बाध्य है और ना ही कोई फैसला मानेगा।













