आंकड़ों के मुताबिक 1950 में यह करीब 65% था जबकि 1960 में रेकॉर्ड 66% पहुंच गया था। साल 2001 में यह 64 फीसदी था लेकिन उसके बाद से इसमें 10.4 फीसदी गिरावट आई है। इस दौरान कॉरपोरेट प्रॉफिट मार्जिन 10.9 फीसदी पहुंच गया है जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा रेकॉर्ड है। इसका मतलब है कि वर्कर्स ज्यादा प्रोड्यूस कर रहे हैं लेकिन मुनाफे का मोटा हिस्सा कंपनियों की जेब में जा रहा है।
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क्या होगा असर?
जानकारों का कहना है कि ऑटोमेशन के यूज से कंपनियों में प्रोडक्टिविटी बढ़ी है लेकिन इसका इस्तेमाल वर्कर्स की सैलरी बढ़ाने के बजाय प्रॉफिट बढ़ाने में किया जा रहा है। इससे देश में अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ रही है क्योंकि केवल कुछ ही लोगों को इसका फायदा हो रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका देश की इकॉनमी पर प्रतिकूल असर हो सकता है।













