तेहरान के आसमान पर शनिवार की सुबह अमेरिकी-इजरायली मिसाइलें दिखीं। बिना संसद की मंजूरी और बिना किसी अंतरराष्ट्रीय चेतावनी के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम से दोनों ने ईरान पर हमला किया। इस हमले में तेहरान के कई सैन्य ठिकाने तबाह हो गए और सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत ईरान की कई बड़ी हस्तियां मारी गईं। यह हमला सिर्फ इमारतों या सत्ता पर नहीं, बल्कि एक विचारधारा पर भी माना जा रहा है। आज करीब 9.2 करोड़ ईरानियों की आबादी दो हिस्सों में बंटी दिख रही है – एक वर्ग इसे अपनी पहचान पर हमला मान रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे बदलाव की शुरुआत के रूप में देख रहा है।
तेहरान अकेला पड़ा
ईरान खुद को लंबे समय से पश्चिमी देशों के खिलाफ एक मजबूत शिया ताकत मानता रहा है। लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। उसका वह नेटवर्क, जिसमें हमास, हिज्बुल्लाह और हूती जैसे संगठन शामिल हैं, जो कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे, अब खुद बचाव की स्थिति में हैं। क्षेत्रीय स्तर पर भी ईरान पहले जितना मजबूत नहीं दिख रहा और काफी हद तक अकेला पड़ गया है।
पहलवी समर्थक सक्रिय
देश के अंदर विपक्ष भले ही बिखरा हुआ हो, लेकिन निर्वासन में रह रहे प्रिंस रजा पहलवी के समर्थक सक्रिय हो गए हैं, जिससे सरकार की चिंता बढ़ गई है। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक पहलवी को खुला समर्थन नहीं दिया है। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका का लक्ष्य सिर्फ सत्ता बदलना नहीं, बल्कि ईरान की सैन्य ताकत को कमजोर करना है।
पुरानी अदावत
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की शुरुआत 1953 से मानी जाती है। उसी साल अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने ‘ऑपरेशन एजेक्स’ चलाकर लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटा दिया। उस समय प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग थे। उनकी सरकार गिरने के बाद शाह मोहम्मद रजा पहलवी को फिर से सत्ता में मजबूत किया गया।
क्रांति से बदलाव
ईरान का समाज मूल रूप से पढ़ा-लिखा और तरक्कीपसंद रहा है। शाह के दौर में देश ने तेजी से आधुनिक रूप लिया। शिक्षा, उद्योग और महिलाओं की भागीदारी जैसे क्षेत्रों में बदलाव आए। लोगों को सोचने और बोलने की आजादी भी मिली। लेकिन, कई लोगों के मन में अमेरिकी दखल की टीस बनी रही। यही असंतोष धीरे-धीरे बढ़ा और 1979 में इसने ईरानी क्रांति का रूप ले लिया। इस क्रांति के बाद सत्ता धार्मिक नेताओं के हाथ में चली गई और देश में सख्त इस्लामी कानून लागू हो गए। एक झटके में ईरान का रास्ता बदल गया।
ट्रंप की मनमानी
कट्टर सत्ता ने दमन का रास्ता चुना और समय-समय पर ‘आधुनिकता’ वापस मांगने वाली अवाम को सख्ती से कुचला गया। इस बार फिर जब ईरान के भीतर एक ज्वालामुखी फटने को तैयार हुआ तो ट्रंप ने कूटनीति का मुखौटा उतार कर सीधे विद्रोहियों का पक्ष लिया। उन्होंने ईरान की टॉप लीडरशिप को चेतावनी दी थी कि अगर विद्रोहियों का खून बहा, तो अंजाम भुगतना होगा। इस सैन्य ऑपरेशन ने साबित कर दिया कि ट्रंप के लिए अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानूनों से ऊपर अमेरिकी हित और मध्य-पूर्व का ‘नया ऑर्डर’ है।
अमेरिका का डर
इस पूरे घटनाक्रम में रूस और चीन की ‘रणनीतिक चुप्पी’ ने कई सवाल खड़े किए हैं। क्या यह अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता का डर है या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ी डील? तेल की सप्लाई चेन पर मंडराते संकट ने होर्मुज स्ट्रेट को दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका बना दिया है। तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं और सोना सुरक्षित निवेश के रूप में अपनी चमक बढ़ा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह युद्ध अमेरिका के 34 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज के बोझ को ‘मैनेज’ करने की एक बड़ी ग्लोबल कवायद भी हो सकता है।
कूटनीति की परीक्षा
भारत के लिए यह खबर मिली-जुली है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए झटका हैं, लेकिन ईरान में लोकतांत्रिक स्थिरता भारत के चाबहार प्रॉजेक्ट और मध्य एशिया तक पहुंचने के रास्ते को सुरक्षित कर सकती है। भारत की ‘तटस्थ कूटनीति’ की यहां कड़ी परीक्षा है।
ईरान में उलझन
लीडरशिप जा चुकी है, सत्ता का गलियारा सूना है। 9.2 करोड़ लोग आज इस उलझन में हैं कि वे अपनी ‘आजादी’ का जश्न मनाएं या आने वाली अस्थिरता से डरें। ट्रंप ने एक पुराने युग को तो खत्म कर दिया, लेकिन क्या वह एक ‘नए और शांत ईरान’ का निर्माण कर पाएंगे? इतिहास उन्हें या तो ईरान का ‘भाग्य-विधाता’ कहेगा या फिर ऐसा ‘खलनायक’ जिसने पूरी दुनिया को महायुद्ध की आग में झोंक दिया।
(लेखक फिल्मकार, कॉलमनिस्ट और राइटर हैं)














