दशकों का प्रभाव
शाह के विरोधी, अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के सबसे करीबी सहयोगी, फिर राष्ट्रपति और सुप्रीम लीडर तक-खामेनेई की तमाम भूमिकाओं का ईरान पर करीब पांच दशकों तक असर रहा। जैसे-जैसे वह मजबूत होते गए, अमेरिका के साथ उनका टकराव भी बढ़ता गया। ट्रंप उन्हें सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे। उनके जाने के बाद ईरान और अमेरिका समेत बाकी दुनिया के लिए भी यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि अब आगे क्या होगा।
अराफी को जिम्मेदारी
ईरानी मीडिया के मुताबिक, अयातुल्ला अलीरेजा अराफी को अंतरिम सुप्रीम लीडर चुना गया है। स्थायी व्यवस्था तक उनके पास जिम्मेदारी रहेगी। सर्वोच्च पद के लिए खामेनेई के बेटे मोजतबा का नाम भी चर्चा में चल रहा है, लेकिन वह अभी तक अयातुल्लाह के पद तक नहीं पहुंचे हैं। हालांकि इतना तय लग रहा है कि बदली स्थितियों में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका और ज्यादा बढ़ने वाली है।
संघर्ष तेज हुआ
ट्रंप चाहते थे कि ईरान की सत्ता से खामेनेई हट जाएं और वह उन्होंने पा लिया, लेकिन सिस्टम तो अब भी पुराना ही है। IRGC को खामेनेई ने खड़ा किया है। नेतृत्व के स्तर पर उसे झटका जरूर लगा है, पर उसकी ताकत अब भी कायम है। पूरे खाड़ी क्षेत्र में हमले तेज कर उसने इसका सबूत दिया। होर्मुज स्ट्रेट में भी ऑयल टैंकर को निशाना बनाया गया।
अमेरिका का अतीत
ईरान की बात करते हुए ट्रंप हमेशा वहां की जनता का जिक्र करते हैं। हालांकि हकीकत यह है कि ईरान पर हमले के विरोध में अमेरिका में ही प्रदर्शन हो गए। सत्ता के खिलाफ गुस्से के बावजूद ईरानी जनता का एक तबका खामेनेई के साथ था। वैसे अमेरिका का खुद का अतीत भी उसके पक्ष में नहीं है। जिन देशों में उसने सत्ता परिवर्तन कराया, वहां हालात पहले से बदतर हो गए। ईरान को लेकर भी डर है कि कहीं पूरा इलाका लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में न घिर जाए।














