जन्मकुण्डली में जातक की दीर्घायु, मध्यायु या अल्पायु देखने की विधि – ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार दीर्घायु न्यूनतम 96 वर्ष तक और अधिकतम 120 वर्ष तक कही गई है। मध्यायु 64 से 80 समझनी चाहिए, अल्पायु 32 से 40 वर्षान्तकाल तक समझनी चाहिए। दीर्घायु, मध्यायु और अल्पायु का निर्णय सर्वप्रथम ऋषि जैमिनी के मतानुसार करना चाहिए। साधारण रूप से आयु की गणना के लिए लग्न, लग्नेश, अष्टम भाव, अष्टमेश की स्थिति देखी जाती है।
परमायुः प्रमाणेन गुणयेत् गत नाडिकाः। नक्षत्रस्य हरेद्भागं नवत्याप्तं विशोधयेत् ।।
परमायुषि पुंसश्च शेषमायुः स्फुटं भवेत्।
दीर्घायु – किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में चर राशि का लग्नेश और चर राशि का अष्टमेश हो अथवा स्थिर राशि का लग्नेश और द्विस्वभाव का अष्टमेश हो अथवा द्विस्वभाव का लग्नेश और स्थिर राशि का अष्टमेश हो तो ऐसे व्यक्ति को दीर्घायु समझना चाहिए।
मध्यायु- चर राशि का लग्नेश और स्थिर राशि का अष्टमेश स्थिर राशि का लग्नेश और चर राशि का अष्टमेश, द्विस्वभाव का लग्नेश और द्विस्वभाव राशि का अष्टमेश
अल्पायु- चर राशि का लग्नेश और द्विस्वभाव का अष्टमेश, स्थिर राशि का लग्नेश और स्थिर राशि का अष्टमेश, द्विस्वभाव का लग्नेश और चर राशि का अष्टमेश
उदाहरण, जातिका का जन्म सिंह लग्न का है, लग्नेश द्वादश भाव में कर्क राशि का बैठा है, जिसके कारण लग्नेश चर राशि में हुआ। जातिका का अष्टमेश गुरु कन्या राशि में बैठा है, जो कि एक द्विस्वभाव राशि है, अतः सूत्र बना, लग्नेश चर राशि में और अष्टमेश द्विस्वभाव राशि में। इस मतानुसार जातिका अल्पायु होनी चाहिए, लेकिन ज्योतिष के ग्रंथों में वर्णित है कि एक प्रकार की गणना से प्राप्त आयु को अन्तिम नहीं मानना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र में जन्म लग्न, होरा लग्न एवं अन्य विधि से आयु की गणना भी आवश्यक है। तीन-चार विधि से आयु जब अल्पायु, मध्यायु का संकेत दे, तभी निश्चित तौर पर आयु के बारे में कहा जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में यह कथन प्रचलित है कि आयु का वास्तविक और निश्चित निर्धारण केवल ब्रह्मा जी ही कर सकते हैं, इसलिए अल्पायु आने पर बहुत ही सोच-समझकर ही सामने वाले को बताना चाहिए।













