यूएई राष्ट्रपति का ये दौरा उस वक्त हुआ है, जब ईरान पर अमेरिकी हमले का खतरा मंडरा रहा है, सऊदी अरब से उसके संबंध काफी खराब हो चुके हैं और पाकिस्तान, सऊदी और तुर्की के साथ मिलकर इस्लामिक NATO बनाने की तैयारी में है। इसीलिए एशिया के दो हिस्से, दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के बीच रणनीतिक साझेदारी हो रही है, जो कई वजहों से आपस में गुंथे हुए हैं। संयुक्त अरब अमीरात को भारत के साथ डिफेंस पैक्ट से स्थिरता मिलती है। वो सऊदी अरब को एक संदेश दे रहा है।
संयुक्त अरब अमीरात को भारत की जरूरत क्यों थी?
यूएई राष्ट्रपति के लिए दिल्ली यात्रा का समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा के लिए जिस बोर्ड का गठन किया है, उसमें कई देश शामिल हैं। ट्रंप, इसमें कई ग्लोबल लीडर्स को शामिल करना चाहते हैं और पाकिस्तान के साथ भारत को भी न्योता मिला है। इसीलिए UAE के लिए भारत जैसे भरोसेमंद और स्वतंत्र पार्टनर की जरूरत पहले कभी इतनी ज्यादा नहीं रही, जितनी अब है।
भारत के ईरान और अमेरिका से अच्छे संबंध- डोनाल्ड ट्रंप की हरकतों को छोड़ दिया जाए तो भारत और अमेरिका पिछले कुछ सालों में काफी करीब आ चुके हैं। जबक भारत के ईरान से भी ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। अबू धाबी, नई दिल्ली के वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ अच्छे संबंध को क्षेत्रीय तनाव कम करने में सहायत मानता है। दूसरी तरफ, भारत वो देश है, जिसकी विदेश नीति आजादी के बाद से ही ‘गुट निरपेक्ष’ की रही है। इसीलिए भारत की विदेश नीति को भरोसेमंद माना जाता है। इसीलिए ईरान और अमेरिका को लेकर भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थ बनता है।
सऊदी-पाकिस्तान रक्षा समझौता- सऊदी अरब और पाकिस्तान ने पिछले साल सितंबर में ‘डिफेंस पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए थे। इसके मुताबिक, एक देश पर हमला दूसर देश पर हमला माना जाएगा। अब इसमें तुर्की भी शामिल होने वाला है। इसीलिए UAE, जिसने पाकिस्तान को भारी भरकम लोन दे रखा है, वहां के नेता और पॉलिसी बनाने वाले लोगों का भरोसा पाकिस्तान से टूट गया है। UAE में पाकिस्तान को सऊदी कैंप का देश माना जाने लगा है। इसीलिए UAE को अब स्वतंत्र पार्टनर की तलाश है। यूएई राष्ट्रपति दिल्ली दौरे में भारत के साथ डिफेंस पार्टनरशिप करके गये हैं, ये सऊदी-पाकिस्तान जैसा नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक गहराई है। दोनों देश एक साथ हथियारों का निर्माण करेंगे।
सोमालीलैंड और यमन को लेकर सऊदी बनाम UAE- यमन की वजह से ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तनाव तेज हुआ है। इसीलिए UAE, खास जियोपॉलिटिकल टकराव वाले मुद्दों पर भारत का सहयोग चाहता है। इजरायल ने हाल ही में सोमालीलैंड को मान्यता दी है, जिससे ये क्षेत्र काफी संवेदनशील हो गया है। दूसरी तरफ, भले ही UAE ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है कि वह यमन के रास्ते सऊदी सुरक्षा को कमजोर कर रहा है, लेकिन दक्षिणी यमन में UAE समर्थित समूहों पर सऊदी अरब के हवाई हमलों ने UAE को सऊदी के खिलाफ कर दिया है। इसीलिए उसे भारत जैसे पार्टनर की जरूरत है।
डिफेंस और न्यूक्लियर एग्रीमेंट- पीएम मोदी और यूएई के राष्ट्रपति अल नाहयान के बीच बातचीत सिर्फ़ संकट पर चर्चा तक सीमित नहीं थी, बल्कि इससे महत्वपूर्ण लंबे समय के सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया। दोनों नेताओं ने एक व्यापक रणनीतिक रक्षा साझेदारी की दिशा में काम करने के लिए एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LoI) पर हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा चर्चा सिविल न्यूक्लियर डील की हो रही है। जिसमें बड़े रिएक्टर और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के ऑपरेशन को लेकर साझेदारी पर चर्चा की गई है।
गाजा शांति प्लान में भारत की भूमिका- डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पीस प्लान (Board of Peace for Gaza) में शामिल होने के लिए भारत के साथ साथ संयुक्त अरब अमीरात को भी बुलाया है। इस बोर्ड की अध्यक्षता डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं और इसमें US के विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ब्रिटेन के पूर्व PM टोनी ब्लेयर जैसी बड़ी हस्तियां शामिल हैं। UAE ने इस बोर्ड में हिस्सा लेने पर “गर्व” जताया है, जो गाजा के स्थिरीकरण, पुनर्निर्माण और निवेश को आकर्षित करने की देखरेख करेगा। इस शांति बोर्ड में भारत का शामिल होना, मिडिल ईस्ट की डिप्लोमेसी में उसके बढ़ते प्रभाव को दिखाता है और यह भी बताता है कि अबू धाबी, नई दिल्ली को अपनी क्षेत्रीय रणनीति का एक जरूरी स्तंभ क्यों मानता है। हालांकि भारत इसमें शामिल होगा या नहीं, फिलहाल नई दिल्ली की तरफ से कुछ कहा नहीं गया है।
लेकिन अबू धाबी के क्राउन प्रिंस और UAE के रक्षा मंत्री, दोनों भारत का दौरा कर चुके हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर और सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने UAE में उच्च-स्तरीय मिशन किए हैं। जनवरी की शुरुआत में जनरल द्विवेदी के दौरे के दौरान उन्हें UAE लैंड फोर्सेज ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया था, जो दोनों देशों के बीच बनने वाले सैन्य संबंध को दर्शाता है और ये रिश्ता किस तरह का होने वाला है, इससे पर्दा आने वाले दिनों में हटेंगे।














