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  • सोशल मीडिया से मिठाई तक, हम नशे का शिकार, मुनाफे के लिए इंडस्ट्री लगा रहीं तरह-तरह की लत

    नई दिल्ली: नशा क्या सिर्फ शराब, सिगरेट या ड्रग्स का ही होता है? सोच कर देखें कि हम कितनी जल्दी जंक फूड खा लेते हैं साल 2024 में दुनियाभर में इसकी बिक्री 820 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई। हम जरूरत से ज्यादा शॉपिंग करने लगे हैं, बिना सोचे-समझे चीजें फेंक देते हैं। इसी वजह


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    By Azad Hind Desk मार्च 1, 2026
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    नई दिल्ली: नशा क्या सिर्फ शराब, सिगरेट या ड्रग्स का ही होता है? सोच कर देखें कि हम कितनी जल्दी जंक फूड खा लेते हैं साल 2024 में दुनियाभर में इसकी बिक्री 820 अरब डॉलर से ज्यादा हो गई। हम जरूरत से ज्यादा शॉपिंग करने लगे हैं, बिना सोचे-समझे चीजें फेंक देते हैं। इसी वजह से 2024 में 400 मिलियन टन प्लास्टिक, 120 मिलियन टन कपड़े और 62 मिलियन टन ई-कचरा फेंका गया। हम अपना फोन भी तब तक नहीं रखते, जब तक कि हमारी आंखें थक न जाएं या हाथ दर्द न करने लगे।

    एक्सपर्टस जता रहे ये चिंता

    औसतन एक शख्स हर दिन 2 घंटे 23 मिनट ‘ट्रेंडिंग’ विडियो देखने, पोस्ट लिखने, फोटोज शेयर करने और शॉपिंग में बिताता है। जिंदगी तनावपूर्ण है, इसलिए दिमाग थोड़ी राहत चाहता है। यही राहत नई कैद बन जाती है। कुछ नशे पुरानी कमजोरियों से जुड़े हैं- जैसे जलन, गुस्सा, दिखावा, ज्यादा खाना और आलस। पहले ये कमियां थीं, आज ये ‘लाइक्स’ और फॉलोअर्स के रूप में दिखती है। सोशल मीडिया हमें लगातार दूसरों से तुलना करने पर मजबूर करता है, जिससे मानसिक नुकसान होता है। अगर लोग सेल्फी लेने और घूमने-फिरने में इतने बिजी हो जाएं कि समाज से जुड़ना भूल जाएं तो समाज कैसा होगा? जरा धरती के बारे में सोचें, भविष्य की चिंता किए बिना हम संसाधनों का बेहिसाब इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां एक्सपर्ट यही चिंता जता रहे हैं:

    आपने अपनी किताब ‘द ऐज ऑफ एडिक्शन’ में पूंजीवाद की वजह से पड़ी आदतों के बारे में ‘लिम्बिक’ शब्द का इस्तेमाल किया है, इसकी वजह?
    हमारे मस्तिष्क का जो हिस्सा (लिम्बिक सिस्टम) खुशी, भावनाओं और सुख की अनुभूति के लिए जिम्मेदार है, आज वही सबसे ज्यादा निशाने पर है। कई ऐसे प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं जो सीधे हमारे दिमाग के इसी हिस्से को प्रभावित करते हैं। इसका असर केवल उस शख्स पर ही नहीं, बल्कि समान पर पड़ता है। तकनीकी रूप से देखें तो ये प्रोडक्ट हमारे शरीर में डोपामाइन का स्तर बढ़ा देते हैं। डोपामाइन एक ऐसा न्यूरोट्रांसमीटर है, जो मस्तिष्क के लिम्बिक एरिया को ऐक्टिव करता है और हमें खुशी या संतुष्टि का अनुभव कराता है। इसी वजह से इस व्यवस्था को ‘लिम्बिक कैपिटलिजम’ कहा जाता है, ऐसी चीजों के विकास में भारी संसाधन लगाए जाते हैं क्योंकि उनसे बहुत ज्यादा मुनाफा कमाया जाता है।

    आजकल कैसा नशा ज्यादा फैल रहा है?
    दुनियाभर में नशे के कॉन्सेप्ट का लगातार विस्तार हो रहा है। पहले कोई अगर नशे की बात करता तो यह माना जाता था कि शराब, हेरोइन या तंबाकू जैसी किसी चीज का जिक्र हो रहा है। लेकिन अब इसमें डिजिटल नशा, ओपिओइड (अफीम से बनी चीजें), जुआ, ज्यादा खाना, खासकर चीनी, फैट, नमक और मसालों से भरपूर खाने-पीने की चीजों का सेवन शामिल है। इसमें वह सब आता है जिसकी हमें क्रेविंग होती है और हम अपना कंट्रोल खो देते हैं।

    इंसानों का दिमाग इस तरह से विकसित हुआ है कि यह हमें अनुकूलन और जिंदा रहने में मदद करे। अब इस पर कैसा असर पड़ रहा है?
    हमारे दिमाग के लिम्बिक सिस्टम का एक मकसद होता है। हमें जीने के लिए खुशी और मोटिवेशन की जरूरत पड़ती है। है। लेकिन अब बाहरी ग्रुप, कॉरपोरेशन या कभी-कभी सरकारें भी जिनका हमारी भलाई का इरादा नहीं होता, वे उस सिस्टम पर कंट्रोल कर लेती हैं। इससे हमारी भूख पर हमारा ही काबू नहीं रहता। लिम्बिक कैपिटलिजम यही है कि कुछ सरकारें और गलत संगठन मिलकर ज्यादा चीजों के उपभोग और ऐसी आदतों को प्रोत्साहित करते हैं। हमारे दिमाग में कुछ और भी जरूरी जरूरी हिस्से हैं, जैसे फ्रंटल कॉर्टेक्स, जिसे साइंटिस्ट एग्जिक्यूटिव कंट्रोल कहते हैं, वह भी ऐसी चीजें को खाने-पीने से प्रभावित होता है या कई बार कमजोर हो जाता है।

    दुनियाभर में वजन घटाने की दवाओं का चलन तेजी से बढ़ रहा है, इसे आप कैसे देखते हैं?
    जिसे मैं प्रॉब्लम प्रॉफिट (समस्या से कमाई) का मॉडल कहता हूं, यह उसका सटीक उदाहरण है। पहले समस्या पैदा की जाती है, फिर उसका समाधान बेचकर दूसरी और तीसरी बार मुनाफा कमाया जाता है जैसे वजन घटाने वाली दवाएं और बैरिएट्रिक सर्जरी। अगर पिछले 100-150 बरसों में फूड इंडस्ट्री में ऐसे क्रांतिकारी बदलाव न हुए होते यानी खाने को बहुत प्रोसेस्ड, हाई-कैलोरी और व्यावसायिक न बनाया होता तो शायद इतने लोग मोटे ही नहीं होते। अगर दुनिया में इतने मोटे लोग न होते तो शायद इतने बैरिएट्रिक सर्जन भी न होते। ये सारे कारण आपस में जुड़े हुए हैं।

    आज के दौर में नशे का इलाज क्या है? खासकर उन नशों का जो नशीली चीजों से जुड़े हुए नहीं है?
    ऐतिहासिक रूप से ऐसी चीजों का विरोध होता रहा है। ऐसा 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ है। जैसे तंबाकू के खिलाफ कैंपेन से सिगरेट की खपत कम हुई। ऐसी ही बुरी आदतों के खिलाफ जो आंदोलन चले उससे महात्मा गांधी भी जुड़े थे। हालांकि, आज डिजिटल लत (जैसे सोशल मीडिया) को दूर करना ज्यादा मुश्किल हैं क्योंकि तकनीक हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुकी है। इसी वजह से चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश टीनेजर्स के सोशल मीडिया यूज को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

    हम देखते हैं कि ‘बहुत टेस्टी’ खाने की चीजों से लेकर मोबाइल फोन तक, ऐसी इंडस्ट्री तेजी से छोटे बच्चों को टारगेट कर रही है, ऐसा क्यों है?
    हमारी ज्यादातर आदतें बचपन में ही बन जाती है। जैसे अगर कोई लड़का या लड़की 25 साल की उम्र तक सिगरेट न पिए तो उसके बाद में सिगरेट पीने की संभावना बहुत कम होती है। लेकिन कोई 10-12 की उम्र में ही सिगरेट पीने लगे तो वह चेन स्मोकर जरूर बन सकता है। कोई इंडस्ट्री अगर मुनाफा चाहे और रेवेन्यू ही उसका मकसद हो तो उसके लिए सबसे अच्छा तरीका है छोटी उम्र वालों को टारगेट करना। ज्यादातर रेवेन्यू नियमित यूजर्स से मिलती है। इकॉनमिस्ट विल्फ्रेडी पैरेटो के नाम पर इसे ‘पैरेटो सिद्धांत’ कहा जाता है। उनका मानना है कि आमतौर पर SO पसेंट या उससे ज्यादा इनकम 20 पर्सेट पक्के कंस्यूमर्स से ही आती है। चाहे वे सोशल मीडिया, सिगरेट, शराब, जंक फूड में से कुछ भी कंस्यूम करते हो।

    जीवाश्म ईंधन की लत छोड़ नहीं पा रही दुनिया मरीना रोमानेलो यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन (UCL) के ग्लोबल हेल्थ इंस्टिट्यूट में रिसर्च फेलो है। यहां वह जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता की लत के बारे में बता रही है:
    मरीना रोमानेलो बताती है कि दुनिया ‘फॉसिल फ्यूल एडिक्शन’ यानी जीवाश्म ईंधन की लत में फंसी हुई है जबकि हमें पता है कि ये हमारी सेहत और धरती दोनों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वह समझाती हैं कि इसे लत क्यों कहा है। दरअसल कोयला, तेल और गैस जलाने से ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। इससे जलवायु परिवर्तन होता है। यही सोर्स वायु प्रदूषण भी पैदा करता है। हर साल करीब 20 लाख मौतें जीवाश्म ईंधन जलाने से जुड़ी होती हैं। हमें पता है कि साफ और सस्ती एनर्जी भी मौजूद है, फिर भी हम ऐसे ईंधनों पर निर्भर है। इसकी वजह है कुछ कंपनियों के हित और धीमे नीतिगत बदलाव, यानी हमें नुकसान पता है, विकल्प भी पता है फिर भी हम इसे छोड़ नहीं पा रहे। ऐसा तभी होता है जब हमें किसी चीज की लत लग जाए हैं।

    सेहत पर क्या असर?
    सबसे ज्यादा फेफड़ों को नुकसान। इससे निमोनिया, कैंसर जैसी क्रॉनिक बीमारिया हो रही है। वायु प्रदूषण की वजह से छोटे जहरीले कण खून में घुस जाते हैं और पूरे शरीर में फैलते है। दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। इतना ही नहीं, दिमाग पर असर होता है, डिमेंशिया और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं सामने आ रही है। गर्भ में पल रहे बच्चो और छोटे बच्चों पर भी गंभीर असर होता है।

    सरकारें सब्सिडी क्यों देती हैं?
    जीवाश्म ईंधन का बाजार इंटरनैशनल पॉलिटिक्स से प्रभावित होता है। जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद गैस की कीमतें बढ़ गईं। कई देशों ने पिछले साल जीवाश्म ईंधनों (जैसे कोयला, तेल और गैस) को लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर की सब्सिडी दी और उससे पिछले साल भी 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की मदद दी थी। अच्छा होता कि यह धनराशि स्वास्थ्य सुधारने, साफ ऊर्जा – मुहैया कराने और लोगों के कल्याण के लिए खर्च की जाती।

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