बांग्लादेश के चुनावों के लिए एक उम्मीदवार ने माना है कि राजनेता ही सांप्रदायिक हिंसा भड़का रहे हैं। इसे वोट जीतने के लिए एक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे-जैसे आम चुनाव करीब आ रहा है, अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले इस पैटर्न के बारे में साफ संकेत देते है। खुफिया रिपोर्ट बताती है कि वोटरों को बांटने के लिए हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने की एक सोची-समझी रणनीति बनाई गई है।
हमलावर कहे जा रहे इस्लाम के सैनिक
इस तरह की हिंसा के पीछे एक व्यवस्थित योजना है जिसे डर के जरिए वोट हासिल करने के लिए डिजाइन किया गया है। न्यूज 18 ने एक सांसद उम्मीदवार का एक वीडियो हासिल किया है। उम्मीदवार ने माना कि राजनेता चुनाव जीतने के लिए हिंदू इलाकों पर हमले भड़काने की रणनीति का इस्तेमाल कर रहे हैं। उम्मीदवार का कहना है कि इन हमलों को अंजाम देने वालों को अब ‘इस्लाम के सैनिक’ के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है।
मौलवियों और राजनेताओं का गठजोड़
अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत को कट्टर इस्लामिक संगठनों के नेता और स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच संगठित गठजोड़ से बढ़ाया जा रहा है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि कट्टर मौलवियों के नफरत भरे भाषण वाले कई क्लिप देखे गए हैं जिसमें लोगों से हिंदू या गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट न देने की अपील करते देखा गया है।
कुछ दिनों पहले ही भारत में रह रही बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस के खिलाफ जमकर हमला बोला था। हसीना ने कहा था कि मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश में आतंक का राज चला रहे हैं। इसके कुछ दिनों बाद ही अवामी लीग के एक पूर्व सांसद बहाउद्दीन नसीम ने फरवरी में होने वाले चुनावों को असंवैधानिक बताया। नसीम ने चुनावी प्रक्रिया को खारिज करते हुए कहा, हम इसे असली चुनाव नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा कि देश के सबसे बड़े और सबसे पुराने राजनीतिक संगठन अवामी लीग पर बैन लगाकर मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश की आधी आबादी को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया है।













