लेकिन अब एक्सपेंडीचर सेक्रेटरी की अगुवाई वाले पब्लिक इन्वेस्टमेंट बोर्ड (PIB) ने रेलवे की परियोजनाओं में निजी कंपनियों को शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया है। समिति ने सुझाव दिया है कि सरकारी बजट से मिलने वाली मदद का इस्तेमाल करके मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स में निजी कंपनियों को जोड़ा जाए। PIB ने यह भी कहा है कि ट्रेन, वैगन और लोकोमोटिव (रोलिंग स्टॉक) की खरीद के लिए भी प्राइवेट कंपनियों के साथ ‘वेट लीज’, ‘हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल’ (HAM) और PPP जैसे तरीकों को अपनाया जाए।
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कौन हैं बेहतर विकल्प?
‘वेट लीज’ का मतलब है कि एक नई लीजिंग कंपनी रोलिंग स्टॉक के साथ-साथ उन्हें चलाने वाले क्रू को भी लीज पर देगी। वहीं, HAM मॉडल में सरकार प्रोजेक्ट बनाने के दौरान 60% लागत निजी कंपनियों को देती है और बाकी 40% लागत किस्तों में दी जाती है। PIB ने सुझाव दिया है कि रेलवे को नीति आयोग से सलाह लेनी चाहिए और आर्थिक मामलों के विभाग के साथ मिलकर ‘मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट’ तैयार करना चाहिए।
रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि सड़क और बिजली जैसे क्षेत्रों की तुलना में रेलवे प्रोजेक्ट्स में PPP लागू करना मुश्किल है। उनके मुताबिक, HAM मॉडल सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है। PIB ने साथ ही कहा है कि रेलवे अपनी कमाई के लिए कोयले की ढुलाई पर बहुत ज्यादा निर्भर है और सरकार ने 2070 तक ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
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लास्ट माइल कनेक्टिविटी
इससे थर्मल पावर प्लांट में कोयले की मांग कम होने की संभावना है, जो रेलवे के लंबे समय के ट्रैफिक अनुमानों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, रेलवे को कोयले की मांग के दीर्घकालिक अनुमानों के लिए बिजली मंत्रालय के साथ तालमेल बिठाना चाहिए। समिति ने साथ ही कहा है कि यदि आवश्यक हो, तो रेलवे को इन अनुमानों के आधार पर अपने नेटवर्क विस्तार योजनाओं में जरूरी बदलाव करने चाहिए। PIB ने यह भी सुझाव दिया है कि लास्ट माइल कनेक्टिविटी का काम आमतौर पर सड़क मार्ग से किया जाना चाहिए, न कि रेल मार्ग से।












