इस याचिका में केंद्र सरकार और उसके संस्थानों द्वारा इस्लामी विद्वान ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह को राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान और प्रतीकात्मक मान्यता प्रदान करने को भी चुनौती दी गई थी।
याचिका में क्या कहा गया
याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह और अन्य की ओर से पेश हुए अधिवक्ता बरुन सिन्हा ने कहा कि मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘चादर’ चढ़ाने की प्रथा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा 1947 में शुरू की गई थी और यह तब से बिना किसी कानूनी या संवैधानिक आधार के जारी है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने क्या कहा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सिन्हा से कहा, ‘‘चूंकि यह मामला तर्कसंगत नहीं है, इसलिए न्यायालय इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा।’’ सिन्हा ने कहा कि निचली अदालत में इस दावे पर एक दीवानी मुकदमा लंबित है कि दरगाह का निर्माण शिव मंदिर के खंडहरों पर किया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका के खारिज होने का लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, ‘‘ आप दीवानी मुकदमे में उचित राहत पाने के लिए आगे बढ़ें।’’
हिंदू संगठन के याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
हिंदू संगठन के सदस्य याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता ने कहा कि वे केंद्र सरकार के विभिन्न माध्यमों द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे ‘राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता की प्रथा’ के जारी रहने से व्यथित हैं।
उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया, ‘‘ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि मोइनुद्दीन चिश्ती उन विदेशी आक्रमणों से जुड़े थे जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर विजय प्राप्त की तथा स्थानीय आबादी का बड़े पैमाने पर दमन और धर्मांतरण किया, यह कार्य भारत की संप्रभुता, गरिमा और सभ्यतागत मूल्यों के बिल्कुल विपरीत था।














