अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से भारत की ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक हितों पर गहरा असर पड़ सकता है। इस वजह से कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है। साथ ही, खाड़ी क्षेत्र में काम कर रहे 80 से 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के संचालन में भी रुकावट आ सकती है। इसके अलावा, भारत के कृषि निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। इन सब वजहों से भारत को एक मुश्किल संतुलन बनाना होगा।
- ईरान दुनिया के तेल उत्पादन का 4-5% हिस्सा देता है। अगर वहां संघर्ष बढ़ता है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। भारत अपनी जरूरत का बहुत सारा तेल आयात करता है, इसलिए यह उसके लिए बड़ी समस्या होगी।
- भारत अपने तेल और एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) का लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से आयात करता है। इस रास्ते में किसी भी तरह की रुकावट भारत के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है।
- आर्थिक मोर्चे पर भी चिंताएं हैं। हालांकि ईरान के साथ भारत का सीधा व्यापार बहुत कम है, यानी भारत के कुल निर्यात का सिर्फ 0.3%। लेकिन अमेरिका उन देशों पर 25% का टैरिफ (शुल्क) लगाने की धमकी दे रहा है जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं।
- इससे भारत के बासमती चावल, फल और मेवों जैसे निर्यात पर असर पड़ सकता है। सप्लाई चेन में दिक्कतें आ सकती हैं, जिससे सामान पहुंचाने और भुगतान करने में भी मुश्किलें हो सकती हैं।
ईरान के चाबहार बंदरगाह पर भारत का फोकस
रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर भी भारत के लिए चुनौतियां हैं। अमेरिका के दबाव के कारण चाबहार बंदरगाह में भारत के निवेश पर असर पड़ सकता है। यह बंदरगाह मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती सैन्य मौजूदगी से सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों में काम कर रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को खतरा बढ़ सकता है।
भारत के लिए ईरान के साथ संतुलन बनाए रखना क्यों जरूरी?
भारत को एक नाजुक संतुलन बनाना होगा। उसे अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखनी है, वहीं ईरान के साथ भी अपने रिश्ते संभालने हैं। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ प्रस्तावों पर भारत अक्सर तटस्थ रहा है या उसका विरोध किया है, जैसा कि हाल के वोटों में देखा गया है। अगर अमेरिका के दबाव के कारण भारत ईरान में अपनी भूमिका कम करता है, तो चीन इस खाली जगह को भर सकता है। इसलिए, भारत को पश्चिम एशिया में अपने हितों की रक्षा के लिए अपनी विदेश नीति को बहुत सावधानी से चलाना होगा।













