अमेरिका के लोर ग्रुप का मुख्यालय न्यूयॉर्क राज्य में है। LMB फैंस और मोटर की स्थापना 60 साल पहले की गई थी। यह कंपनी दुनियाभर में अपने खास तरीके से डिजाइन किए गए उच्च क्षमता वाले फैंस और मोटर के लिए जानी जाती है। इसके फैन और ब्रशलेस मोटर का इस्तेमाल कई एयरोस्पेस कंपनियां और डिफेंस प्लेटफार्म करते हैं। फ्रांस अपने राफेल फाइटर जेट और एयरोस्पेस सेक्टर में रणनीतिक स्वायत्तता पर गर्व करता है। ऐसे समय पर जब अमेरिका लगातार सैन्य तकनीक के निर्यात में तमाम शर्तें थोप रहा है और विदेशी सरकारों को इसे मानने के लिए बाध्य कर रहा है, फ्रांस की यह रणनीतिक स्वायत्तता दुनिया के अन्य देशों के लिए बड़ा सहारा थी।
तुर्की को अमेरिका ने F-35 प्रोग्राम से बाहर किया
तुर्की ने जब रूस से एस 400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा तो अमेरिका ने उसे एफ-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया। यही नहीं हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को धमकी दी कि अगर उसने फ्रांस या स्वीडन से फाइटर जेट लिया तो वह ओटावा को उत्तर अमेरिका एयरोस्पेस डिफेंस कमांड से बाहर कर देंगे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां अक्सर राफेल फाइटर जेट को एक ताकतवर फाइटर जेट बताते थे जिसमें कोई शर्तें नहीं जुड़ी होती हैं। यह अमेरिका के निर्यात प्रतिबंधों से भी मुक्त है। राफेल को अपग्रेड किया जा सकता है और उसे दूसरे देश को भी बेचा जा सकता है।
यूरेशिया टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस की कंपनी LMB राफेल जेट, फ्रांसीसी परमाणु सबमरीन, एयरबस टाइगर हेलिकॉप्टर, टैंक और अन्य सैन्य वाहनों के लिए फैन सप्लाई करती है। यह कंपनी अमेरिका के फाइटर जेट जैसे एफ-15, एफ-16 और एफ-18 तथा अपाचे और ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टरों के लिए भी फैन की आपूर्ति करती है। LMB ने ही फ्रांस के एकमात्र परमाणु एयरक्राफ्ट कैरियर चार्ल्स डी गाले को भी फैन दिया है। फ्रांस के वित्त मंत्रालय ने इस डील को मंजूरी दे दी है।
भारत फ्रांस से खरीद रहा 100 से ज्यादा राफेल
वहीं फ्रांस के नैशनल असेंबली में वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही समूहों ने इस डील का कड़ा विरोध किया जो अपने आप में दुर्लभ है। वहीं फ्रांस की सरकार ने सफाई दी है कि उसे सभी रणनीतिक फैसलों में वीटो करने का अधिकार होगा। फ्रांस चाहे जो दावा करे लेकिन अमेरिका के प्रतिबंधों से बचना आसान नहीं होगा। भारत भी फ्रांस से 100 से ज्यादा राफेल फाइटर जेट ले रहा है, ऐसे में अब उसे भी भविष्य में अमेरिकी कंपनी पर निर्भर होना पड़ेगा।













