असम की अहमियत । असम में इस साल मार्च-अप्रैल में चुनाव हो सकते हैं। यह उन कुछ राज्यों में से एक है, जहां कांग्रेस संगठन अब भी मजबूत है। राज्य में 10 साल पहले तक कांग्रेस की सरकार थी और आज भी मुख्य विपक्षी ताकत वही है। इस साल अप्रैल-मई तक पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में प्रियंका को असम की जिम्मेदारी मिलना अहम माना जा रहा है।
पार्टी का भरोसा । प्रियंका भले नवंबर 2024 में पहली बार वायनाड से उपचुनाव के जरिये लोकसभा में पहुंची हों, लेकिन उनका राजनीतिक अनुभव कहीं अधिक है। राहुल गांधी ने जब 2004 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा, तो चुनावी प्रचार की कमान प्रियंका ने ही संभाली थी। उनकी तुलना दादी इंदिरा गांधी से की जाती रही है और कांग्रेस के भीतर यह भरोसा है कि वह अगर पूरी तरह सामने आकर जिम्मा संभालें, तो पार्टी फिर से मजबूत हो सकती है।
यूपी से अलग । हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले प्रियंका को यूपी में महासचिव बनाया गया था और पूर्वी यूपी के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी उन पर थी, लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। लेकिन, एक हकीकत यह भी है कि यूपी में कांग्रेस का संगठन बेहद कमजोर स्थिति में था। प्रियंका ने जोश तो भरा, लेकिन उसे परिणाम में बदलने के लिए उनके पास जमीनी स्तर पर उस तरह का समर्थन मौजूद नहीं था।
समन्वय में मदद । यूपी के मुकाबले असम में कांग्रेस बहुत बेहतर स्थिति में है। स्क्रीनिंग कमिटी का काम होता है उम्मीदवारों के नामों का चयन करना। हालांकि प्रियंका की भूमिका इससे ज्यादा की हो सकती है। असम में भी पार्टी गठबंधन में उतरेगी। बिहार में जिस तरह की गड़बड़ी हुई, नेतृत्व नहीं चाहेगा कि वैसा असम में हो। प्रियंका जैसे कद का नेता होने से असंतोष कम करने और समन्वय बैठाने में मदद मिलेगी। प्रियंका कई मौकों पर साबित कर चुकी हैं कि वह कुशल वक्ता हैं। वंदे मातरम् पर संसद में बहस के दौरान उन्होंने जिस तरह से कांग्रेस का रुख रखा था, उसकी पार्टी के अंदर और बाहर वाहवाही हुई थी। अब पार्टी असम में भी उनसे ऐसे ही कमाल की आशा कर रही है।














