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  • आत्मा की निरंतर यात्रा को समझें, जिससे आगामी जन्म दुःख मुक्त हो

    मनुष्य जब जीवन को केवल संग्रह की दृष्टि से देखने लगता है, तब वह यह भूल जाता है कि धन उसका स्वामी नहीं, बल्कि एक साधन है। मोह की यही भ्रांति उसे कंजूसी, निर्दयता और आत्मकेंद्रितता की ओर ले जाती है। एक बार देवऋषि नारद यात्रा पर निकले। मार्ग में चलते हुए उनकी दृष्टि एक


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    By Azad Hind Desk जनवरी 11, 2026
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    मनुष्य जब जीवन को केवल संग्रह की दृष्टि से देखने लगता है, तब वह यह भूल जाता है कि धन उसका स्वामी नहीं, बल्कि एक साधन है। मोह की यही भ्रांति उसे कंजूसी, निर्दयता और आत्मकेंद्रितता की ओर ले जाती है।

    एक बार देवऋषि नारद यात्रा पर निकले। मार्ग में चलते हुए उनकी दृष्टि एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के समीप जूठी पत्तलों का ढेर लगा हुआ था, जिन पर मिठाइयों के अवशेष पड़े थे। उसी समय एक भूखा कुत्ता उन जूठी पत्तलों को खाने की आशा में धीरे-धीरे दुकान के पास आया। जैसे ही कुत्ता पत्तलों के निकट पहुंचा, दुकान के मालिक ने उसे निर्दयता से डंडा मार दिया। पीड़ा से कराहता हुआ कुत्ता वहां से भाग गया। यह दृश्य देखने वालों के लिए साधारण प्रतीत हो सकता था, परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से यह कर्मफल के गूढ़ सत्य को प्रकट कर रहा था।

    देवऋषि नारद ने इस दृश्य को देखकर मुस्कान प्रकट की। इसका कारण यह था कि यह घटना पूर्व जन्म के कर्मों का परिणाम थी। पूर्व जन्म में यही मिठाई की दुकान एक अत्यंत कंजूस व्यक्ति की थी। उसने अपने जीवन में अपार धन एकत्र किया, परंतु कभी दान, सेवा या करुणा का भाव नहीं अपनाया। उसका संपूर्ण जीवन केवल संग्रह और स्वार्थ में ही व्यतीत हो गया। उसी स्वार्थपूर्ण जीवन के फलस्वरूप उसे इस जन्म में कुत्ते की योनि प्राप्त हुई। विडंबना यह थी कि जिस पुत्र और संपत्ति के लिए उसने अपने मानव जीवन में अथक परिश्रम किया था, वही पुत्र इस जन्म में उसका तिरस्कार कर रहा था। उसे न केवल भोजन से वंचित किया गया, बल्कि अपमान और पीड़ा भी सहनी पड़ी। यह कथानक इस सत्य को स्पष्ट करता है कि मोह में किया गया कर्म अंततः दुःख का कारण बनता है।

    जीवन का उद्देश्य केवल धन-संचय नहीं, बल्कि सद्कर्म, दान और करुणा के साथ जीवन जीना होना चाहिए। जो मनुष्य अपने वर्तमान कर्मों को शुद्ध करता है, वही अपने भविष्य और आने वाले जन्मों को भी उज्ज्वल बनाता है। जब जीवन केवल ‘मेरा’ और ‘मेरे लिए’ तक सीमित रह जाता है, तब शरीर में विद्यमान आत्मा अपने आगे के जन्मों का कल्याण नहीं कर पाती है। मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन उसका मोह है, विशेषकर धन और अपनों के प्रति आसक्ति। स्वार्थपूर्ण कर्मों का फल आत्मा को जन्म-जन्मांतर तक भोगना पड़ता है।

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