भारत-यूरोपियन यूनियन में डिफेंस डील
ET की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच डिफेंस इंडस्ट्री में सहयोग बढ़ाने के लिए एक नया यूरोपियन यूनियन इंडिया डिफेंस इंडस्ट्री फोरम स्थापित किया जा रहा है। योजना ये है कि इसके तहत दोनों ओर की रक्षा कंपनियों को एक मंच पर लाया जाए, जिससे रक्षा उद्योग और इसके कारोबार को बुलंदी मिल सके। यह फोरम इस बात को देखेगा कि वह कौन से क्षेत्र हैं, जिनमें आपसी सहयोग का अवसर है। फोरम में भारत और यूरोपियन यूनियन सरकार के लोग ऑब्जर्वर के तौर पर उपस्थित रहेंगे।
यूरोप के कई देशों से भारत के मजबूत संबंध
ब्रिटेन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड जैसे देशों को छोड़ दें तो यूरोपियन यूनियन में यूरोप के सारे बड़े देश शामिल हैं। भारत का फ्रांस, जर्मनी, स्पेन और इटली के साथ पहले से ही बेहतर रक्षा संबंध हैं। यूरोप के ये देश भारत को वेपन सिस्टम के बड़े सप्लायर रहे हैं। लेकिन, अब हालात बदलने लगे हैं। यूरोप के देशों को भारत से भी निर्यात पिछले दो वर्षों में काफी बढ़ गए हैं। खासकर के यूरोप के देश भारत से गोला-बारूद और विस्फोटक मंगाकर अपना रक्षा भंडार भर रहे हैं।
वेपन मैन्युफैक्चरिंग का हब बनेगा भारत
नई संधि से रक्षा क्षेत्र के संबंधों में और मजबूती आने वाली है। यूरोपियन यूनियन चाहता है कि वह रक्षा क्षेत्र में अपनी टेक्नोलॉजी दे और भारत में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे, ताकि सप्लाई चेन का दायरा बढ़ाया जा सके। भारत में मैन्युफैक्चरिंग की जो क्षमता है, उससे यूरोपियन यूनियन को भी ताकत मिलनी तय है। ईयू के विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास का कहना है कि नई डील से समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और साइबर सुरक्षा में भी सहयोग बढ़ाने में मदद मिलेगी।
भारत-यूरोपियन यूनियन की नेवी में तालमेल
यह रक्षा संधि सिर्फ हथियारों के निर्माण और कारोबार तक ही सीमित नहीं रहेगी। यूरोपियन यूनियन भारतीय नौसेना के साथ भी सक्रिय सहयोग को बढ़ाना चाहता है। इसके लिए संयुक्त युद्धाभ्यास भी आयोजित होंगे, जिनमें ग्रुप से बाहर के देश भी शामिल हो सकते हैं। समझौते के तहत पश्चिमी हिंद महासागर में इंडियन नेवी और ईयू के सदस्यों की नेवी के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को भी ज्यादा बेहतर बनाने की तैयारी है।
गिनी की खाड़ी तक बढ़ेगा दबदबा!
सबसे बड़ी बात ये है कि आगे चलकर भारतीय नौ सेना यूरोपियन यूनियन की नौ सेना समु्द्र के उन इलाकों में भी साझा अभियान बढ़ाएगी, जिनसे दोनों के हित जुड़े हुए हैं। इनमें से गिनी की खाड़ी भी शामिल है, जो समुद्री डकैती के चलते कुख्यात है। अटलांटिक महासागर में यह पश्चिमी अफ्रीका का प्रवेश द्वार है। हर साल इस खाड़ी में करीब 100 व्यापारिक जहाज समुद्री डाकुओं का निशाना बनते हैं। लेकिन, प्राकृतिक तौर पर यह बहुत ही समृद्ध क्षेत्र है। यहां दुनिया के पेट्रोलियम का 35% से ज्यादा भंडार है। इसके अलावा यह क्षेत्र यूरेनियम, हीरा, तांबा जैसे खनिजों से भी भरपूर है।















