तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस वक्त 61 देशों को पत्र लिखकर मदद मांगी, मगर सिर्फ तीन देश ही ऐसे थे, जो भारत की मदद के लिए राजी हुए थे।
ये देश थे-पूर्व सोवियत संघ, इजरायल और यूगोस्लाविया। जाने-माने लेखक श्रीनाथ राघवन की किताब-‘1971’ के हवाले से जानते हैं भारत-इजरायल की दोस्ती के बनने की कहानी। यह किताब बांग्लादेश के निर्माण की वजह बनी 14 दिवसीय लड़ाई पर नया नजरिया पेश करती है।
भारत के फ्रांस में राजदूत के एक लेटर से हुई थी शुरुआत
- राघवन के शोध से पता चलता है कि भारत के फ्रांस में राजदूत डीएन चटर्जी ने 6 जुलाई, 1971 को विदेश मंत्रालय को एक पत्र लिखकर इजरायल से हथियार हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की थी।
- उन्होंने कहा था कि इजरायल से ‘प्रचार, वित्तपोषण और यहां तक कि हथियार एवं तेल की खरीद’ के लिए सहायता ‘अनमोल’ होगी।
- इंदिरा गांधी ने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और देश की खुफिया एजेंसी RAW (Research and Analysis Wing) के माध्यम से लिकटेंस्टीन की छोटी रियासत के रास्ते हथियार हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की।
भारत ने इजरायल के बनने के खिलाफ किया था मतदान
हिंदुस्तान टाइम्स में इस किताब के हवाले से कहा गया है कि आजादी के बाद भारत के इजरायल के साथ राजनयिक संबंध नहीं थे। दरअसल, भारत ने 1948 में इजरायल के बनने के खिलाफ मतदान किया था और इजरायल-फलस्तीन संघर्ष में लगातार अरबों का समर्थन किया था।
जब इजरायली पीएम ने भारत की ओर भेज दिए हथियार
- किताब के अनुसार, 1971 के दौरान इजरायल हथियारों की कमी से खुद जूझ रहा था। हालांकि, इसके बाद भी इजरायली प्रधानमंत्री गोल्डा मीर ने ईरान के लिए भेजे जा रहे हथियारों को भारत की ओर मोड़ने के लिए कह दिया।
- गोल्डा मीर ने गुप्त हस्तांतरण का काम संभाल रही फर्म के निदेशक श्लोमो जाबुलडोविच के माध्यम से इंदिरा गांधी को हिब्रू भाषा में एक पत्र भेजा, जिसमें हथियारों के बदले राजनयिक संबंध स्थापित करने की अपील की गई थी। हालांकि, राजनयिक संबंध 1992 में ही स्थापित हो सके, जब नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे।
पाकिस्तान के सरेंडर करने से पहले पहुंचे इजरायली हथियार
- 4 अगस्त, 1971 को तत्कालीन सशस्त्र सशस्त्र बल प्रमुख आरएन काव द्वारा हक्सर को लिखे गए एक अन्य पत्र का जिक्र राघवन की पुस्तक में भी मिलता है। इस पत्र में विस्तार से बताया गया था कि इजरायली प्रशिक्षकों के एक दल के साथ हथियारों को हवाई मार्ग से कैसे पहुंचाया जाएगा।
- ये हथियार आखिरकार भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी (बंगालियों की गुरिल्ला सेना) के पास पहुंचे। इसके बाद पाकिस्तान ने अपने 93,000 फौजियों के साथ 16 दिसंबर, 1971 को ढाका में भारतीय सेना के समक्ष सरेंडर कर दिया।
पाकिस्तान ने जब ईरान से कर ली थी सीक्रेट डील
- पुस्तक में अन्य खुलासे ईरान और पाकिस्तान के बीच एक गुप्त समझौते से संबंधित हैं, जिसके तहत भारतीय हमले की स्थिति में कराची को हवाई सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान था।
- हालांकि, ईरान के शाह ने सोवियत संघ से जवाबी कार्रवाई के डर से इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया। मगर, पाकिस्तान का यह कदम उल्टा पड़ गया।
इंदिरा चीन के दखल को लेकर चिंतित थीं
दिलचस्प बात यह है कि जहां इंदिरा गांधी चीन के दखल को लेकर चिंतित थीं, वहीं भारतीय दूतावास के तत्कालीन प्रभारी ब्रजेश मिश्रा ने एक आधिकारिक आकलन भेजा था कि चीन युद्ध से दूर रहेगा। ब्रजेश मिश्रा बाद में अटल विहारी वाजपेयी सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने।
अमेरिका का भी जंगी बेड़ा भेजने का दांव धरा रह गया
- आखिरकार भारत को डराने के लिए सातवें बेड़े को भेजने का अमेरिका का कदम भी उल्टा पड़ गया। अमेरिकी जहाजों के पहुंचते ही भारत ने आक्रमण तेज करने का फैसला किया और ढाका की ओर तेजी से बढ़ने के लिए टांगेल में पैराशूट से सैनिकों को उतारा।
- राजधानी पर कब्जा होते ही भारत ने किसी भी अंतरराष्ट्रीय शक्ति के हस्तक्षेप से पहले ही पाकिस्तान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया।













