भारत, चीन, तुर्की, पोलैंड और कजाकस्तान समेत कई देशों के सेंट्रल बैंक पिछले कुछ सालों से जमकर सोना खरीद रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इसमें तेजी आई है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने विदेशों में जमा रूसी एसेट्स को फ्रीज कर दिया था। यही कारण है कि दुनिया के देश अब डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैंऔर सोने का भंडार बढ़ा रहे हैं। आज ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में सोने की हिस्सेदारी यूरोप, येन और पाउंड की कंबाइंड हिस्सेदारी से ज्यादा है।
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सोने में उछाल
यही कारण है कि सोने की कीमत में हाल में काफी तेजी आई है। पिछले साल सोने की कीमत 65 फीसदी उछली थी जो 1979 के बाद इसकी सबसे बड़ी सालाना उछाल थी। इस दौरान यूएस डॉलर इंडेक्स में 9.4 फीसदी गिरावट आई। यह अमेरिकी करेंसी का 8 साल में सबसे खराब प्रदर्शन है। ट्रंप भी डॉलर की घटती लोकप्रियता से वाकिफ हैं। कुछ समय पहले जब ब्रिक्स देशों ने अपनी करेंसी लाने की बात कही थी तो ट्रंप ने उन पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी।
बढ़ते कर्ज, टैरिफ को लेकर अनिश्चितता, महंगाई की आशंका और फेड रिजर्व के ब्याज दरों में कटौती की संभावना से निवेशकों के लिए डॉलर ज्यादा आकर्षक नहीं रह गया है। टैरिफ को लेकर ट्रंप की बार-बार बदलती नीति ने भी अमेरिकी करेंसी के प्रति निवेशकों के भरोसे को कमजोर किया है और अमेरिकी बॉन्ड्स को नुकसान पहुंचाया है। कुछ जानकारों का मानना है कि डॉलर का कमजोर होना ट्रंप की रणनीति के अनुकूल है क्योंकि इससे देश को फिर से महान बनाने की उनका लक्ष्य पूरा हो सकेगा।













