इस्लामिक नाटो का जिक्र कैसे शुरू हुआ
दरअसल, पश्चिम एशिया, पूर्वी भूमध्य सागर और दक्षिण एशिया में तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक रक्षा समझौता किया। इस समझौते के अनुसार, एक देश पर हमला, दूसरे पर हमला माना जाएगा। इसके बाद से इन दोनों देशों ने दूसरे मुस्लिम मुल्कों को भी इस सैन्य गठबंधन में शामिल होने का निमंत्रण देना शुरू किया। इस बीच पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने बयान दिया कि अगर और ज्यादा मुस्लिम देश ऐसी व्यवस्थाओं में शामिल होते हैं, तो “यह प्रभावी रूप से एक नया NATO बन जाएगा।”
इस्लामिक नाटो की जरूरत किसको है
दरअसल मध्य पूर्व के मुस्लिम देश अमेरिका से स्वतंत्र एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की तलाश कर रहे हैं। इन देशों में सबसे प्रमुख सऊदी अरब है। उसे लगता है कि दूसरे मुल्क क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और संघर्ष के दौरान अमेरिका से ज्यादा उसकी सहायता करेंगे। दरअसल, सऊदी अरब का अपने पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के साथ संबंधों में गंभीर तनाव है। सऊदी अरब पहले अमेरिका के साथ गैर नाटो सहयोगी के तौर पर बड़ा रक्षा समझौता करना चाहता था, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इजरायल को मान्यता देने और अब्राहम समझौते में शामिल होने की शर्त रख दी है। इस कारण वह पाकिस्तान को साथ लेकर इस्लामिक नाटो बनाने को निकल पड़ा है।
मध्य पूर्व में अमेरिका की विश्वसनीयता खत्म क्यों हो गई
सितंबर 2025 में, इजरायल ने कतर के दोहा में हमास नेतृत्व को निशाना बनाते हुए हवाई हमला किया था। इसमें हमास के कुछ नेता समेत कतर का एक सैन्य अधिकारी मारा गया था। कतर ने इजरायल के इस हमले को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया था। यह हमला विशेष रूप से चिंताजनक था क्योंकि कतर में इस क्षेत्र में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। इससे खाड़ी देशों में अमेरिकी सुरक्षा की गारंटी की विश्वसनीयता के बारे में संदेह पैदा हुआ।
इस्लामिक नाटो अव्यवहारिक क्यों
इस्लामिक नाटो में अभी सिर्फ दो देश ही शामिल हैं, पाकिस्तान और सऊदी अरब। तुर्की ने इस गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया का एक मात्र परमाणु सशस्त्र राष्ट्र है, ऐसे में उसे इस काल्पनिक गठबंधन का मुख्य स्तंभ बताया जाता है। लेकिन, पाकिस्तान अमेरिका पर आर्थिक, वित्तीय और सैन्य रूप से काफी ज्यादा निर्भर है। अमेरिका पाकिस्तानी सेना पर काफी प्रभाव रखता है। खासकर पाकिस्तानी परमाणु संपत्तियों के मामले में पाकिस्तान पूरी तरह से अमेरिका का कहा मानता है। वहीं, सऊदी अरब भी अमेरिका पर काफी ज्यादा निर्भर है और बिना अमेरिका की मंजूरी के कुछ नहीं कर सकता। ऐसे में ये दोनों देश इजरायल जैसे दुश्मनों के हमले में चाहकर भी अमेरिका को नाराज करते हुए कुछ नहीं कर सकते हैं।













