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  • ईरान की मोजैक रणनीति क्या है? 4 दिन के युद्ध में ही हांफने लगा अमेरिका, ट्रंप के लिए ‘नरक’ बन रहा शिया देश

    तेहरान/वॉशिंगटन: तालिबान अगर 20 साल बाद की लड़ाई के बाद भी जिंदा रहा तो उसके पीछे उसकी रणनीति और अफगानिस्तान के भौगोलिक हालात थे। ईरान भी अमेरिका के लिए ऐसी ही चुनौती पेश करने वाला है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में अपनी सेना भेजने की बात से इनकार नहीं किया है। लेकिन यकीन मानिए अगर


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    By Azad Hind Desk मार्च 3, 2026
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    तेहरान/वॉशिंगटन: तालिबान अगर 20 साल बाद की लड़ाई के बाद भी जिंदा रहा तो उसके पीछे उसकी रणनीति और अफगानिस्तान के भौगोलिक हालात थे। ईरान भी अमेरिका के लिए ऐसी ही चुनौती पेश करने वाला है। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में अपनी सेना भेजने की बात से इनकार नहीं किया है। लेकिन यकीन मानिए अगर अमेरिकी सैनिक ईरान पहुंचते हैं तो वियतनाम और अफगानिस्तान की तरह ही उसे जलील होकर बाहर निकलना पड़ सकता है।

    ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने अपनी डिफेंस स्ट्रैटजी में एक बड़ा बदलाव किया है। उसने डिसेंट्रलाइज़्ड यानि विकेंद्रीकरण मोजेक डिफेंस डॉक्ट्रिन को पूरी तरह से लागू कर दिया है। इस स्ट्रैटजी के तहत IRGC के प्रांतीय कमांडरों को पूरी आजादी दे दी गई है। यानि उन्हें किसी तरह का ऑपरेशन चलाने के लिए अब केन्द्रीय सैन्य नेतृत्व की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सेन्ट्रल कमांड लाइन पर हमला किया है जिसके बाद मोजेक डॉक्ट्रिन को लागू किया गया है।

    ईरान ने अपनी डिफेंस स्ट्रैटजी में बड़ा बदलाव क्यों किया?

    अमेरिका और इजरायल ने ईरान की केन्द्रीय लीडरशिप, सैन्य नेतृत्व, हथियार भंडार पर हमले किए हैं। उसके इलेक्ट्रॉनिक युद्ध ने ईरान के कम्युनिकेशन सिस्टम को जाम कर दिया है। केन्द्रीय नेताओं को मारा जा रहा है। इसीलिए ईरान में प्रांतीय सैन्य अधिकारियों को अपने हिसाब से युद्ध लड़ने के अधिकार दे दिए गये हैं, ताकि उन्हें कोई कदम उठाने के लिए बार बार इजाजत नहीं लेनी पड़े।

    मोजेक डिफेंस सिस्टम अफरातफरी के हालात में निपटने के लिए बनाया गया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने 1 मार्च को शेखी बघारते हुए कहा था कि ईरान अब तय करेगा कि यह लड़ाई “कब और कैसे” खत्म होगी।

    मोजेक डिफेंस युद्ध में कैसे काम करता है?

    इस रणनीति के तहत IRGC को 31 अलग अलग यूनिट्स में बांटा गया है। एक तेहरान के लिए और बाकी 30 अलग अलग प्रांतों के लिए। हर यूनिट के कमांडर के पास टैक्टिकल शक्ति होगी और वो अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा। ये कमांडर खुद तय कर सकते हैं कि उन्हें मिसाइस दागना है या ड्रोन। गुरिल्ला युद्ध करना है या फिर कैसे युद्ध लड़ना है। उन्हें किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी।

    ऊबड़-खाबड़ पहाड़ और रेगिस्तानों को युद्ध लड़ने का नया सेंटर बनाया गया है। ये पूरी तरह से गुरिल्ला युद्ध है जैसा तालिबान ने अफगानिस्तान में किया था। जैसा वियतनाम में हुआ था। ईरान की भौगोलिक स्थिति भी काफी मुश्किल है। रेगिस्तान और पहाड़ दोनों मौजूद हैं। इसे डिफेंस इन डेप्थ कहा जाता है। ये रणनीति हमलावरों की लड़ने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करता है। ये युद्ध को लंबा खींचता है।

    IRGC के लिए मोजेक डिफेंस रणनीति कारगर साबित होगा?

    युद्ध अगर लंबा खिंचता है तो किसी हमलावर देश के लिए जंग लड़ना काफी मुश्किल हो जाता है। अमेरिका और इजरायल को जंग लड़ने सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर से आना होगा और ईरानी सैनिकों को कहीं जाने की जरूरत नहीं है। पूरी सेना देश के अलग अलग हिस्सों में जम जाएगी। ये युद्ध का काफी कारगर तरीका है।

    ईरान ने पिछले दिनों इस रणनीति के साथ कई युद्धाभ्यास किए हैं। इसीलिए उन्हें लगता है कि वो दुश्मनों को एक अंतहीन लड़ाई में फंसा सकते हैं। अमेरिका-इजरायल यही नहीं चाहते। वो यूक्रेन में रूस का हस्र देख रहे हैं।

    ईरान के शातिर कमांडरों का असली मकसद क्या है?

    हमलावरों को जंग के मैदान में बुरी तरह से थका देना। घात लगाकर हमला करने के लिए इलाके के भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल करना। हमले को एक बुरा सपने में बदल देना। ईरान, अमेरिका को वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे जाल में बुरी तरह से उलझा देना चाहता है। ये मकड़ी के जाल की तरह होगा।

    यकीन मानिए ये युद्ध अब अमेरिका-इजरायल के शरीर से चिपक गया है। IRGC के पास जमीनी, नेवी और हवाई बल तीनों है। विदेश मंत्री अराघची का कहना है कि इससे ईरान का आखिरी कंट्रोल लॉक हो जाता है। सिर्फ आसमान से तेहरान पर बम गिराकर अमेरिका नुकसान तो बहुत पहुंचा सकता है लेकिन देश में सत्ता परिवर्तन नहीं करवा पाएगा। बिना सैनिकों को उतारे सरकार का तख्तापलट करना अत्यंत मुश्किल है।

    व्यापारिक मार्गों पर अचानक हमला

    मोजेक फोर्स कहीं भी अचानक हमला करेगी। बिल्कुर सरप्राइज हमला। कहीं किसी व्यापारिक मार्ग पर। ये तेल के फ्लो पर असर डालेगा। इससे GCC जैसे साथी देशों के माथे पर पसीना आ जाएगा। US-इजरायल को कभी न खत्म होने वाली छोटी-मोटी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। कोई तुरंत जीत नहीं। एस्केलेशन की संभावना बढ़ जाएगी। इसीलिए अब दुनिया देखेगी कि क्या मोजेक दो शक्तियों को हरा पाता है या फिर ये टूटकर बिखड़ जाता है?

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