जेम्स एम. गुस्ताफ़सन अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं। सृजना मित्रा दास से हुई इस खास बातचीत में उन्होंने ईरान में पर्यावरण से जुड़े बदलावों के बारे में विस्तार से बताया है:
आपकी रिसर्च किस बारे में है?
मेरी रिसर्च का फोकस ईरान का इतिहास और पर्यावरण है। मेरी किताब ‘द लायन एंड द सन’ ईरान के आधुनिक पर्यावरणीय इतिहास का एनालिसिस करने वाली पहली किताब है जो बताती है कि इंसानों का जीवन जानवरों, पौधों, पानी, मिट्टी और जलवायु जैसे कुदरती तत्वों के साथ कितनी गहराई से जुड़ा रहा है। ईरान का इतिहास केवल इसानों की कहानी नही बल्कि इसान और कुदरत के रिश्ते की कहानी भी है।
ईरान के पर्यावरण की खास बातें क्या है?
ईरान की धरती बहुत समृद्ध है। इसका भीतरी हिस्सा सूखा और बंजर है, जो दो बड़ी पर्वत शृंखलाओं से घिरा है। बीच में बड़ा-सा वर्षा क्षेत्र है। यहां ऐतिहासिक रूप से सिंचाई का क़नात सिस्टम काम करता था। यहां घास के मैदान फैले हैं, जहां चरवाहे रहते हैं। नॉर्थ की ओर अल्बोर्ज पर्वत शृंखला के पार वर्षावन और घने जंगलों के इलाके हैं।
आपकी रिसर्व में 18वीं सदी के ‘लिटिल आइस एज’ और ईरान के पतन के बीच रिश्ता बताया गया है। इसे थोड़ा विस्तार से समझाएं?
17वीं और 18वीं सदी के दौरान, उत्तरी गोलार्ध में कृषि प्रधान भूमि साम्राज्य जलवायु पैटर्न में बदलाव से भारी दबाव में आ गए थे। कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखा था जबकि कुछ जगह बारिश, बाढ़ और अनियमित मौसम था, जैसा इन दिनों देखा जाता है। ईरान ने यूरेशिया, चीन या नॉर्थ यूरोप के दूसरे हिस्सों की तुलना में उस संकट का ज्यादा वक्त तक सामना किया। उस वक्त सफवी (Safavid) राजवश का शासन था। जलवायु परिवर्तन से पैदा हुई गंभीर मुश्किलों ने उसे जकड़ लिया। सूखा, महामारियों आदि से एक तिहाई से आधी आबादी का सफाया हो गया। व्यवस्था कमजोर हुई और राजवंश का पतन हो गया। ईरान शुरुआती आधुनिक काल में प्रमुख वाणिज्यिक और सैन्य शक्ति था जो 19वी सदी में ब्रिटिश और रूसी हमलों के समय कमजोर-बंटा हुआ राज्य बन गया। सफवी साम्राज्य के पतन के बाद 7 दशकों तक युद्ध चला, जिसमें नादिर शाह जैसे शासकों ने विशाल सेनाएं खड़ी की, अनाज और घोड़ों का भंडारण किया, जिससे सकट और भी गहरा गया।
ईरान में पानी-हवा को लेकर मौजूदा अनुभव कैसे हैं?
ईरान हाल के बरसों में पर्यावरण से जुड़ी आपदा का सामना कर रहा है। वहा 90% से ज्यादा पानी का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल खेती में होता है, जो जमीन और जलभंडारों की सहनशीलत के परे है। कावेह मदानी ने इसे ‘जल दिवालियापन (वॉटर बैंकरप्सी)’ कहा है।
क्या पानी की चिंता राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों को बढ़ावा दे रही है?
मैं उन ईरानियों की ओर से नहीं बोलूगा जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं और जिन्हें भारी सरकारी हिंसा का सामना करना पड़ा है। हालांकि, यह साफ है कि इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ शिकायतों ने राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ पर्यावरण से जुड़ी मांगो को भी एकजुट कर दिया है। 2021 में ‘महिला, जीवन, आजादी’ विरोध-प्रदर्शन शुरू होने से पहले पर्यावरण से जुड़े प्रदर्शन भी हुए, खासकर इस्फहान में जहां खेती के लिए पानी मोड़ने से जायदरूद नदी सूख गई थी। कई लेख बताते हैं कि तेहरान के बाहरी इलाकों में रहने वाले शहरी गरीब इंडस्ट्री के पलूशन का सामना कर रहे है। पानी और ऊर्जा की कमी, बढ़ती महगाई और बेरोजगारी जैसी परेशानिया भी है।
वहां जलवायु परिवर्तन की स्थिति कैसी है?
ज्यादा परेशानी दशको से हो रहा बेकाबू डेवेलपमेट है, जिसमे पानी को अनलिमिटेड रिन्यूएबल रिसोर्स मान लिया गया है। लेकिन जल भंडार सूखे तो धरती उन्हें संकुचित कर देती है।
ईरान में तेल की क्या भूमिका रही है?
बहुत-से लोगों ने तेल को देश की राजनीति बिगाड़ने वाली भ्रष्ट दौलत बताया है। तेल ऐसा संसाधन है, जो कई जगह बड़ी मात्रा में मौजूद है। टिम मिशेल ने अपनी किताब ‘कार्बन डेमोक्रेसी’ में लिखा है कि कपनियो ने प्रॉडक्शन कम किया, जिससे तेल की बनावटी कमी बनी रहे, इससे कीमतें ऊंची रहती है और मुनाफा होता है। लेकिन यह तरीका सरकार के हितों से टकराता है क्योकि सरकार को देश मे तेल निकलने के मुताबिक रॉयल्टी मिलती थी। ईरान में तेल इंडस्ट्री विकसित करने के लिए मालिकाना हक को लेकर भी नई व्यवस्था बनानी पड़ी। एक तरफ शाह (ईरान के सग्राट) का दावा था कि देश के सभी कुदरती संसाधन उसके हैं और वह उन्हें विदेशी निवेशको को बेच सकता है। दूसरी तरफ, आम लोगों ने कहा कि जिस जमीन के नीचे तेल है, उस पर उनका अधिकार है। तेल इंडस्ट्री चलाने के लिए सरकार को सड़कें, रिफ़ाइनरी, पाइपलाइन जैसे बुनियादी ढांचे और तकनीकी विशेषज्ञता भी विकसित करनी पड़ी। बड़ा असर यह हुआ कि तेल इडस्ट्री से जुड़ा मजदूर वर्ग तैयार हो गया। 20वी सदी में यहीं मजदूर वर्ग राजनीतिक रूप से भी जागरूक और सक्रिय हो गया।
विकास की पाइपलाइन में करप्शन और गैरबराबरी!
सिरुस मोवाहेदी-लंकरानी अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया में ईरानी स्टडीज़ के एक्सपर्ट हैं। वे आधुनिक ईरान के इतिहास पर काम करते है। वह कहते है, ‘मेरा फोकस खासतौर से इस बात पर है कि तेल और नेचरल गैस जैसी एनर्जी ने ईरान के विकास, राजनीति और पर्यावरण को कैसे बदला। 1950 के दशक से ईरान की ऊर्जा खपत में नेचरल गैस का योगदान लगभग जीरो से बढ़कर तीन-चौथाई हो गया।’
तेल और गैस की कहानी
सिरुस का कहना है, ‘हमें तेल और नेचुरल गैस को अलग-अलग चीजें नही समझना चाहिए। जब ईरान तेल निकाल रहा था- चाहे विदेशी कपनियों के माध्यम से या बाद में राष्ट्रीय स्तर पर संचालित तेल कपनी के माध्यम से, तब वे नेचुरल गैस का उत्पादन भी कर रहे थे। विदेशी तेल कपनिया गैस में दिलचस्पी नहीं लेती थी क्योंकि उसे निकालना और इस्तेमाल करना महंगा था। इसलिए गैस को इस्तेमाल में लाने की जिम्मेदारी ईरानियों पर आ गई। 1953 में तत्कालीन प्रधानमत्री मोहम्मद मोसादेक के तख्तापलट के बाद फिर से विदेशी कंट्रोल बढ़ा। इसी दौर में नेचुरल गैस राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता, उपनिवेशवाद-विरोध और सप्रभुता से जोड़ दी गई। तब ईरानियों ने यहां तक कहा कि यह हमारी एनर्जी है, इसलिए हमें ही इसका फायदा उठाना चाहिए।’
पाइपलाइन और तकनीक वह कहते है कि मैंने अपनी किताब ऐक्सेलरट [Accelerant) में बताया है कि पाइ्पलाइन बहुत अहम थी। चाहे शाह का पहलवी शासन हो या बाद का इस्लामिक रिपब्लिक, दोनों ने बड़ी गैस रिफाइनरियां और लबी पाइपलाइन बनाईं। ईरान के पहाड़ी इलाकों मे यह काम बहुत महंगा और मुश्किल था। फिर भी इसे आत्मनिर्भर बनने का रास्ता माना गया।
पर्यावरण और प्रदूषण
वह कहते हैं, ‘जब नेचरल गैंस के लिए बुनियादी ढांचा बन रहा था, उसी समय ईरान तेजी से इंडस्ट्रियल देश बन रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि 1940 की शुरुआत से 1970 के दशक तक शहरों में भयानक एयर पॉल्यूशन हो गया। खासकर तेहरान, जो पहाड़ों के बीच बसा है और जहां पॉल्यूशन फंस जाता है। ईरानी लोगों को इसका अहसास था कि विकास से पैसा और सुविधाए आएंगी। लेकिन वे कुदरती सुदरत और साफ पर्यावरण को पीछे छोड़ रहे थे। उन्होने लंदन और लॉस एंजिलिस जैसे शहरों को देखा, जहा लोग स्मॉग और पलूशन से मर रहे थे। उन्हें इस बात का अहसास था फिर भी लोग कारें चला रहे थे, जीवाश्म ईंधन इस्तेमाल कर रहे थे और नेचरल गैस को अपने सपने पूरे करने का जरिया मान रहे थे।”
उस ईरानी क्रांति की वजह
1950 के दशक से ईरानी सरकार का वादा रहा कि हम विकास के साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय देंगे। शाह के समय भी यही कहा गया, क्राति के बाद भी। लेकिन गैरबराबरी और करप्शन बहुत ज्यादा था। यही गुस्सा 1979 की ईरानी क्रांति की बड़ी वजह बना।














