ईरान पर इजरायल की चुप्पी क्यों?
इजरायली डिफेंस इंटेलिजेंस के पूर्व अधिकारी डैनी सिट्रिनोविस इस समय इजरायल के नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज इंस्टीट्यूट में ईरान के सीनियर रिसर्चर हैं। उन्होंने बीबीसी को बताया कि यह चुप्पी बताती है कि नेतन्याहू के लिए कितना जरूरी समय है। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू इसे एक सुनहरा मौका मानते हैं, जिसे वे गंवाना नहीं चाहते। खासतौर पर खाड़ी में अमेरिका का विशाल जंगी बेड़ा तैनात है।
एक्सपर्ट का मानना है कि इस चुप्पी के पीछे यरुशलम की सोची समझी रणनीति है। इजरायली शीर्ष नेतृत्व में इस बात पर सहमति है कि इस बार वॉशिंगटन को पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा, अमेरिकी ज्यादा मजबूत हैं, उनके पास ज्यादा क्षमताएं हैं और उन्हें कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी हासिल है।
इजरायल चुप लेकिन शांत नहीं
हालांकि, इजरायल चुप जरूर है लेकिन शांत नहीं है और न ही हाथ पर हाथ धरे बैठा है। इस सप्ताह की शुरुआत में इजरायल के मिलिट्री इंटेलिजेस चीफ श्लोमी बाइंडर ने वॉशिंगटन में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ बैठक कीं। इजरायली मीडिया रिपोर्टों में बताया कि इस दौरान ईरान के अंदर संभावित लक्ष्यों पर चर्चा की गई।
सिट्रिनोविज का मानना है कि नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका बड़े हमले करे जो ईरानी नेतृत्व को खत्म या बहुत कमजोर कर दें। उन्होंने जनवरी की शुरुआत में ट्रंप को ईरान पर कदम पीछे खींचने को कहा था क्योंकि अमेरिका की संभावित कार्रवाई बहुत सीमित मानी जा रही थी।
इजरायल क्यों चाहता है हमला?
मध्य पूर्व में अमेरिकी सहयोगी जहां सत्ता परिवर्तन को लेकर चेतावनी दे रहे हैं कि इससे क्षेत्र अस्थिर हो सकता है। वहीं, इजरायल इसमें सुरक्षा के नजरिए से फायदे देख रहा है। इजरायल में जिम्मेदार लोगों का मानना है कि तेहरान में नेतृत्व बदलने से बैलिस्टिक मिसाइलों का खतरा खत्म हो सकता है। इससे हिजबुल्लाह जैसे ईरान के प्रॉक्सी हथियारबंद समूह भी कमजोर हो सकते हैं।













