इजरायल के नैशनल सिक्यॉरिटी स्टडीज के शोधकर्ता डॉक्टर योएल गुजानस्की ने इजरायली अखबार वाइनेट में छपे एक लेख में कहा कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत कर रहा है। उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों और ईरान के करीबी देशों के दबाव में यह बातचीत हो रही है। डॉक्टर योएल ने कहा कि खाड़ी देशों का मानना है कि अगर इलाके में सैन्य संघर्ष छिड़ता है तो यह उनकी सुरक्षा, आधारभूत ढांचे और अर्थव्यवस्था के लिए सीधा खतरा होगा। पहले ऐसी उम्मीद थी कि खाड़ी के मुस्लिम खुलकर अपने विरोधी ईरान पर हमले का सपोर्ट करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
सऊदी और यूएई पर हमला कर चुके हैं ईरान एवं हूती
सऊदी अरब से लेकर खाड़ी के अन्य मुस्लिम देशों ने सार्वजनिक तौर पर ईरान पर हमले का विरोध किया है। इन देशों ने खुद को तटस्थ देश के रूप में पेश किया है। ये देश अब अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे से बातचीत करा रहे हैं ताकि हमले को टाला जा सके। खाड़ी देशों को सबसे बड़ा डर यह है कि ईरान उनके इलाके में मौजूद अमेरिकी बेस और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बना सकता है। साल 2019 में ईरान ने सऊदी अरब के अरामको तेल केंद्र पर हमला कर दिया था। वहीं यमन के हूतियों ने साल 2022 में यूएई पर मिसाइल हमला किया था। वहीं जून 2025 में ईरान ने कतर में अमेरिकी बेस पर एक सांकेतिक हमला करके अपनी ताकत का इजहार किया था।
ईरान पर अमेरिका ने हमला किया तो क्या होगा ?
खाड़ी देशों के अधिकारियों को डर है कि ईरान इस बार ज्यादा भीषण हमला कर सकता है। इसी दौरान खाड़ी देशों को यह भी चिंता सता रही है कि अमेरिकी हमला बहुत अधिक सफल हो सकती है जिससे ईरान इस्लामिक शासन ढह सकता है। अगर ईरानी शासन का पतन होता है तो यह स्थिरता नहीं लाएगा बल्कि अराजकता को लाएगा। इससे आंतरिक संघर्ष शुरू हो जाएगा, संस्थाओं का पतन होगा, अतिवादी ताकतें मजबूत होंगी, शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी और इन संकटों के स्पष्ट हल का तरीका नहीं होगा। खाड़ी देशों ने यह भी कहा है कि वे ईरान पर हमला करने के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देंगी। ये देश चाहते हैं कि एक समझौता हो ताकि ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाई जाए। इन देशों को ईरान की मिसाइलों का डर है और उनके पास इजरायल की तरह से आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भी नहीं है।













