शीर्ष अदालत ने जस्टिस वर्मा की ओर से दी गई उस दलील से सहमति जताने से इनकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राज्यसभा के उपसभापति को किसी प्रस्ताव को खारिज करने का अधिकार नहीं है। जस्टिस वर्मा के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम उपसभापति को महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार नहीं देता। यह अधिकार लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को ही है।
जस्टिस वर्मा की याचिका पर फैसला सुरक्षित
रोहतगी ने कहा कि उपसभापति, सभापति के सामान्य कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते है, लेकिन न्यायाधीश (जांच) अधिनियम में केवल लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति का ही उल्लेख है। कही यह नहीं कहा गया है कि सभापति का अर्थ उपसभापति भी होगा। इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा कि अधिनियम की परिभाषा संबंधी धाराओं में ‘जब तक संदर्भ अन्यथा न हो’ जैसे शब्दों का भी प्रयोग है।
जस्टिस वर्मा केस क्या है?
गौरतलब है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में 14-15 मार्च 2025 की रात आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान फायर सर्विस को स्टोर रूम से जले हुए नोटों की गड्डियां मिलीं, जिनके वीडियो भी वायरल हुए। उस वक्त जस्टिस वर्मा बंगले में मौजूद नहीं थे और उनकी पत्नी ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी। जांच में यह कैश अनएकाउंटेड बताया गया।
इस घटना के एक हफ्ते बाद जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया, जहां फिलहाल उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है।














