मतदाता सूची का विशेष संशोधन पारदर्शी
अपनी दलीलें जारी रखते हुए वकील चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का यह विशेष संशोधन पूरी तरह से निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और पारदर्शी था। उन्होंने इस अभियान को मनमाना बताए जाने का खंडन किया और कोर्ट में याचिका दायर करने वालों की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार में इस प्रक्रिया के दौरान जिन 66 लाख लोगों के नाम हटाए गए, उनमें से कोई भी शिकायत लेकर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट नहीं आया और न ही उन्होंने चुनाव आयोग में कोई अर्जी दी। उन्होंने कहा कि एडीआर और पीयूसीएल जैसी संस्थाओं और कुछ सांसदों के कहने पर बिना किसी ठोस सबूत के व्यापक जांच की इजाजत नहीं दी जा सकती।
अमेरिका का हवाला यहां नहीं दिया जा सकताः चुनाव आयोग
याचिकाकर्ताओं ने अमेरिकी कानून के ‘ड्यू प्रोसेस’ का हवाला दिया था, जिस पर चुनाव आयोग ने कहा कि अमेरिकी धारणाओं को भारतीय संविधान में नहीं लाया जा सकता। उन्होंने कहा कि अमेरिका खुद नियमों का पालन नहीं कर रहा है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिकी अदालतों के फैसलों का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन वहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति को मुकदमे के लिए उठा सकते हैं और अब वे ग्रीनलैंड भी चाहते हैं। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता उस व्यवस्था को यहां लाना चाहते हैं जो सही नहीं है।
पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन
पारदर्शिता पर जोर देते हुए वकील राकेश द्विवेदी ने बताया कि बूथ लेवल एजेंटों ने घर-घर जाकर सत्यापन किया और मतदाताओं को 5 करोड़ से ज्यादा एसएमएस अलर्ट भेजे गए। उन्होंने दावा किया कि पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को क्या कहा था?
गौरतलब है कि इससे पहले बुधवार को बेंच ने टिप्पणी की थी कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची के संशोधन के लिए असीमित शक्तियां नहीं हो सकतीं। यह प्रक्रिया दिशा-निर्देशों, पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत होनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उन लोगों पर गंभीर असर पड़ सकता है जिनके नाम लिस्ट में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी चीज से लोगों के नागरिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो यह प्रक्रिया 1950 के अधिनियम की धारा 21 के अनुसार ही होनी चाहिए।














