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  • ऑर्डर कम हुए, तो घर कैसे चलेगा! 10 मिनट में डिलीवरी खत्म होने से गिग वर्कर्स की जिंदगी में क्या बदला?

    नई दिल्ली: सरकार के हस्तक्षेप के बाद क्विक-कॉमर्स कंपनियों ने 10 मिनट में डिलीवरी का वादा वापस ले लिया है। यह कदम गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर उठाई गई चिंताओं के जवाब में उठाया गया है। हालांकि कई गिग वर्कर्स का कहना है कि इससे उनकी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने


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    By Azad Hind Desk जनवरी 15, 2026
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    नई दिल्ली: सरकार के हस्तक्षेप के बाद क्विक-कॉमर्स कंपनियों ने 10 मिनट में डिलीवरी का वादा वापस ले लिया है। यह कदम गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर उठाई गई चिंताओं के जवाब में उठाया गया है। हालांकि कई गिग वर्कर्स का कहना है कि इससे उनकी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा डिलीवरी की संख्या पर निर्भर करता है, इसलिए तेज डिलीवरी का दबाव उन पर बना रहेगा। असली बदलाव तब आएगा जब कंपनियों द्वारा एक न्यूनतम वेतन, बीमा और अन्य सुरक्षा उपाय लागू किए जाएंगे।

    गिग वर्कर्स ने क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर हड़ताल की थीं। उनका कहना है कि न्यूनतम वेतन की कोई गारंटी न होने और प्रति डिलीवरी रेट कम होने के कारण वे प्लेटफॉर्म द्वारा दिए जाने वाले इंसेंटिव पर बहुत अधिक निर्भर हैं। लेकिन समस्या यह है कि इंसेंटिव की नीति रोज बदलती है और कई बार तो एक ही दिन में कई बार बदल जाती है।

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    इंसेंटिंव का चक्कर

    हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम दिल्ली में काम करने वाले 19 साल के एक डिलीवरी पार्टनर ने बताया कि एक दिन में ₹1,200-1,500 कमाने के लिए उसे 35 से अधिक डिलीवरी करनी पड़ती हैं और वह मुश्किल से अपना गुजारा कर पाता है। उसने बताया कि गिग वर्कर लगभग 15 घंटे काम करने के बाद ₹1,500-1,600 कमा पाते हैं। अधिक से अधिक डिलीवरी करने और इंसेंटिव कमाने के लिए वे रॉन्ग साइड से गाड़ी चलाते हैं और अपनी जान जोखिम में डालते हैं।

    हालांकि किसी निश्चित समय सीमा के भीतर डिलीवरी करने की कोई मजबूरी नहीं है, लेकिन कई इंसेंटिव तभी मिलते हैं जब डिलीवरी की एक निश्चित संख्या पूरी हो जाती है। यही कारण है कि इंसेंटिव पाने के चक्कर में गिग वर्कर्स को जल्दी डिलीवरी करनी पड़ती है। 26 साल के एक डिलीवरी पार्टनर ने बताया, ‘₹440 का इंसेंटिव कमाने के लिए, मुझे ₹875 कमाने होंगे। मुझे 6 बजे से पहले की डिलीवरी पर लगभग ₹15 और उसके बाद लगभग ₹25 मिलते हैं। तो मोटे तौर पर, मुझे एक दिन में लगभग 40 डिलीवरी करनी होंगी।’

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    कैसे चलेगा घर?

    बेंगलुरु की सड़कों पर डिलीवरी पार्टनर्स के लिए थोड़ी कम भाग-दौड़ वाली स्थिति है, क्योंकि क्विक-कॉमर्स कंपनियों ने 10-मिनट डिलीवरी का दावा छोड़ दिया है। टाइम्सनाउ के मुताबिक एक डिलीवरी पार्टनर ने कहा, ‘पहले, हर ऑर्डर एक दौड़ जैसा लगता था लेकिन अब थोड़ी राहत मिलेगी। लोग सोचते हैं कि हम सिर्फ डिलीवरी बॉय हैं। लेकिन हमारे भी परिवार हैं जो हमारा इंतजार कर रहे हैं। चीजों को धीमा करना ऐसा लगता है जैसे किसी ने आखिरकार स्वीकार किया कि हमारी जान मायने रखती है।’

    लेकिन कुछ वर्कर्स को अब अपनी कमाई कम होने का डर सता रहा है। मुंबई के एक डिलीवरी पार्टनर ने कहा, ‘मैं सुरक्षित डिलीवरी का समर्थन करता हूं, लेकिन सच कहूं तो, मुझे अपनी इनकम की चिंता है। तेज डिलीवरी से मिले इंसेंटिव से मुझे किराया और ईएमआई का भुगतान करने में मदद मिली है। मेरे लिए हरेक रुपया मायने रखता है। अब पता नहीं कि ऑर्डर कम आएंगे या हमे चुपचाप बाहर कर दिया जाएगा।’ लखनऊ में अदीब ने कहा, ‘दिल से देखो तो अच्छा है… सुरक्षा बढ़ेगी। पर दिमाग बोलता है पैसे का क्या? अगर ऑर्डर्स कम हुए, तो घर का खर्चा कैसे चलेगा?’

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