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  • क्या है त्रिजटा स्नान, माघ मेले में त्रिजटा स्नान का है विशेष महत्व

    Magh Mela 2026 : माघी पूर्णिमा को स्नान करके अधिकांश कल्पवासी त्रिवेणी संगम का तट उसी दिन छोड़ देते हैं, क्योंकि पूर्णिमा के बाद अगले दिन पड़वा तिथि को प्रस्थान उत्तम नहीं माना जाता है, इसलिए जो कल्पवासी माघी पूर्णिमा को कल्पवास पूरा कर अपने घरों की ओर प्रस्थान नहीं कर पाते, वे परम्परा अनुसार


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    By Azad Hind Desk फरवरी 4, 2026
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    Magh Mela 2026 : माघी पूर्णिमा को स्नान करके अधिकांश कल्पवासी त्रिवेणी संगम का तट उसी दिन छोड़ देते हैं, क्योंकि पूर्णिमा के बाद अगले दिन पड़वा तिथि को प्रस्थान उत्तम नहीं माना जाता है, इसलिए जो कल्पवासी माघी पूर्णिमा को कल्पवास पूरा कर अपने घरों की ओर प्रस्थान नहीं कर पाते, वे परम्परा अनुसार तीन दिन तक त्रिजटा स्नान कर उसके बाद अपने घरों को प्रस्थान करते हैं। माघी पूर्णिमा का स्नान पर्व सम्पन्न हो जाने के बाद अधिकांश कल्पवासी माघ मेले को पूर्ण मानकर प्रस्थान की तैयारी करते हैं, लेकिन प्रयागराज में माघ मेले की व्यवस्था 15 फरवरी 2026, दिन रविवार, महाशिवरात्रि तक विद्यमान है।

    त्रिजटा की डुबकी
    त्रिजटा स्नान को लेकर बहुत सारी मान्यताएं हैं। कुछ श्रद्धालु त्रिजटा स्नान तीन दिन तक न करके एक ही दिन में त्रिजटा के नाम से तीन डुबकी लगाकर इस स्नान को पूर्ण करते हैं। विद्वानों की मानें तो त्रिजटा का अभिप्राय तीन जप अर्थात तीन माह के जप से है। इसके तहत पौष पूर्णिमा का स्नान, उसके बाद माघी पूर्णिमा का स्नान सम्पन्न करके तीसरे माह की तिथि के लिए फाल्गुन में तिथि अनुसार स्नान करने की मान्यता है।

    त्रिजटा स्नान की परंपरा
    जिस प्रकार ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पापं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किया गया पाप बज्रलेप की भांति कभी नहीं मिटता, उसी प्रकार त्रिजटा स्नान के बाद ‘तीर्थक्षेत्रे कृतं पुण्यं बज्र लेपो भविष्यति’ यानी तीर्थक्षेत्र में किए गए पुण्य भी बज्रलेप की भांति कभी क्षय नहीं होते। त्रिजटा स्नान के साथ ही त्रिजटा की परंपरा और संकल्प पूर्ण होता है। सामान्य कल्पवासी भले ही मेला क्षेत्र छोड़ दें, पर कल्पवास के विधान को जानने वाले त्रिजटा स्नान के बाद ही संगम की रेती को प्रणाम करके विदाई लेंगे।

    माघ मास में किए गए जप, तप, स्नान की परंपरा में हुई त्रुटि के निमित्त ही तीन तिथियों के अतिरिक्त स्नान की परंपरा है। माघ माह में कल्पवास पूरा करने के बाद भले ही बड़ी संख्या में कल्पवासियों की तंबुओं की नगरी से रवानगी हो गई है पर ‘पूर्ण कल्पवास’ की मान्यता वाले संत, श्रद्धालु ‘त्रिजटा’ स्नान के बाद ही संगम की रेती से विदा लेंगे।

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