बाल सुधार गृह है फेल
हक- सेटर फॉर चाइल्ड राइट्स की डायरेक्टर भारती अली हक कहती है, यह सिर्फ पुलिस एनफोर्समेंट का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारकों का परिणाम है। शेल्टर होम्स इतने बदहाल हैं, जहां सुधार होता ही नहीं। छोटे क्राइम करने वाले बच्चों को वहां छह महीने से ज्यादा नहीं रख सकते लेकिन वो एक-एक साल तक वहां पड़े रहते है। वहां कोई वोकेशनल ट्रेनिंग नहीं दी जाती। काउंसलर्स या तो है ही नहीं, या बिना क्वॉलिफिकेशन के है।
बजट की कमी, ओवरक्राउडिंग, मैनेजमेंट की खामियां, अनट्रेंड स्टाफ, स्किल्स डिवेपलमेंट के नाममात्र के कोर्स के साथ ये दोषी नाबालिगों की राह को सही रास्ता नहीं दे पा रहे, ना ही रिपीट ऑफेंडर्स की दर को कम करने में बड़ी भूमिका निभा पा रहे हैं।
सुरक्षा पर.04% बजट
भारती अली कहती है, हमें ट्रेंड काउंसलर्स के साथ फ्री मेंटल हेल्थ क्लिनिक्स, फ्री हेल्पलाइंस की जरूरत है। इसके साथ ही स्कूल एजुकेशन, रोजगार, पैरेंटिंग, शेल्टर होम्स में कई पहलुओं पर काम करना होगा, तब जाकर आएगा बदलाव। हम बच्चों पर खर्च ही नहीं कर रहे हैं। मौजूदा बजट में बाल सुरक्षा पर महज 0.04% ही खर्च कर रहे हैं। इसके अलावा हमें बच्चे को एक ऐसी स्पेस देनी की जरूरत है, जहां वो खुलकर मन की बात कर सकें और उन्हें बिना जज किए सुना जाए।
पैरंट्स से वो बात नहीं करना चाहते, स्कूल के काउंसलर्स का रोल ज्यादातर अच्छा नहीं रहता, बातें लीक होती हैं। अब बात आती है साइकलॉजिस्ट तक पहुंच की, जो आम आदमी अफोर्ड कर ही नहीं सकता तो वो कैसे करेंगे?
‘जो देखते हैं, वही सीखते हैं’
मनोवैज्ञानिको के अनुसार टीनएजर्स का ‘रिवार्ड सिस्टम’, जो रोमांच, उत्तेजना और तुरंत खुशी चाहता है, बहुत एक्टिव होता है। वो 24-25 साल की उम्र तक भी पूरी तरह परिपक्व नहीं होता। क्लिनिकल साइकलॉजिस्ट डॉ. मोनिका कुमार कहती है, घरवालों, टीचर्स, न्यूज, टीवी सीरियल्स, फिल्मों, आसपास के लोगों, का प्रभाव वच्चे पर पड़ता है।
अपराध में धंसने के ये आधार
पीयर प्रेशर : फ्रेंड सर्कल आपराधिक गतिविधियों में शामिल है या दिखावटी लाइफस्टाइल फॉलो कर रहा है तो टीनएजर भी ग्रुप की ताकत से जोखिम वाला बर्ताव अपना लेते हैं।
बेरोजगारी और आर्थिक दबाव : अवसरों की कमी और आर्थिक निराशा, खासकर लोअर इनकम क्लास में चोरी और लूट जैसे स्ट्रीट क्राइम जैसे अपराधों की ओर धकेल सकती है।
असुरक्षा और हिंसक माहौल : अगर बच्चे गैंगवॉर, दंगों या लगातार हिंसा वाले माहौल में बड़े होते हैं तो उन्हें आक्रामक व्यवहार सामान्य लगने लगता है, जो आगे मुसीबत बनता है।
सामाजिक भेदभाव : अपमान, असमान व्यवहार और सामाजिक बहिष्कार से पैदा हुआ गुस्सा असामाजिक व्यवहार में बदल सकता है। यहां से आइडेंटिटी क्राइसिस होती है।
बचपन की हिंसा /मानसिक दिक्कतः बचपन में शारीरिक या भावनात्मक शोषण मानसिक आधात देती है। इससे अवसाद के अलावा कंट्रोल करने की भावना पैदा होती है।
सबक लेने की है दरकरार
किशोर गैंग और स्कूल अपराध सिंगापुर: नब्बे के दशक में चिंता का विषय बने तो सरकार ने सख्त कानून के साथ-साथ अर्ली इंटरवेशन प्रोग्राम, स्कूल और फैमिली काउंसलिंग और कम्युनिटी मेटरशिप लागू किए। सिंगापुर पुलिस की ‘येलो रिबन’ पुनर्वास पहल और सरकार के स्किल्स ट्रेनिंग प्रोग्राम की मदद से दोबारा अपराध की दर में बड़ी गिरावट आई।
स्कॉटलैंड : 2000 के दशक में ग्लासगो में युवा चाकूबाजी इतनी बढ़ गई थी कि इसे ‘यूरोप की मर्डर कैपिटल’ कहा जाने लगा। वॉयलेस रिडक्शन यूनिट बनाई गई। हिंसा को जुर्म नहीं बल्कि ‘पब्लिक हेल्थ इश्यू’ माना गया। पुलिस, डॉक्टर, टीचर और सोशल वर्कर मिलकर रिस्क वाले युवाओं की पहचान करने लगे। स्कूल प्रोग्राम, मेंटरशिप, रोजगार ट्रेनिंग, परिवार परामर्श और गैंग से बाहर निकलने के लिए मदद दी गई, जेल के भीतर भी।
लंदन: कोविड महामारी के बाद 2020-21 में कुछ इलाको में युवा चाकूबाजी की घटनाएं चिंता का कारण बनी। लंदन वॉयलेंस रिडक्शन यूनिट ने स्कूलों में मेटॉरशिप, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जुवेनाइल ऑफेंडर्स की ट्रैकिंग शुरू की गई, महज दो साल में गिरावट दर्ज की गई।
मेक्सिको: ड्रग कार्टेल हिंसा से नाबालिग शामिल होने के मामले बढे तो सरकार ने सामुदायिक खेल, शिक्षा और पुनर्वास केंद्रों को मजबूत किया, बढ़िया रिजल्ट मिले।
ब्राजील : गरीबी और शहरी गैंग कल्चर के कारण युवाओं में हिंसक अपराध काफी हाई रहा। ‘बोल्सा फैमिलिया’ जैसी सामाजिक योजनाओं और कम्युनिटी पुलिसिंग से कई शहरों में युवा अपराध दर में गिरावट आई।
साउथ अफ्रीका : वॉयलेस प्रिवेशन थू अर्बन अपग्रेडिंग प्रोग्राम के साथ असुरक्षित बस्तियों में बुनियादी ढांचे, खेल और कौशल कार्यक्रमों से युवाओं को अपराध से दूर रखने की कोशिश की, कुछ इलाकों में अच्छे परिणाम मिले।













