दरअसल, अमेरिका यहां पर अपना गोल्डन डोम डिफेंस सिस्टम लगाना चाहता है ताकि रूस और चीन की मिसाइलों से अमेरिका को बचाया जा सके। ट्रंप अपने ही सहयोगी देशों ब्रिटेन के पीएम कीर स्टार्मर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और इटली की पीएम जार्जिया मेलोनी का मजाक उड़ा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति तब ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं जब यूक्रेन युद्ध की वजह से यूरोप के कई नाटो देश बुरी तरह से घिरे हुए हैं और रूस के उनके ऊपर भी हमले का खतरा मंडरा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो को दी टैरिफ की धमकी
यही नहीं डोनाल्ड ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय देशों पर भारी भरकम टैरिफ लगाने की धमकी दे रहे हैं। नाटो का आर्टिकल 5 कहता है कि अगर एक सदस्य देश पर दुश्मन का हमला होता है तो यह सभी देशों पर अटैक माना जाएगा। यही नहीं इस जंग में नाटो के हर सदस्य देश को सैन्य सहायता देना होगा। नाटो के महासचिव जनरल मार्क रट ने सोमवार को खुलासा किया कि अमेरिकी सैन्य सहायता के बिना यूरोप अपनी खुद की रक्षा नहीं कर सकता है। उन्होंने यूरोपीय सांसदों से कहा कि यूरोप और अमेरिका को एक-दूसरे की जरूरत है।
विदेशी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर राजकुमार शर्मा ने रूसी मीडिया स्पुतनिक से बातचीत में कहा कि इस बात की संभावना बहुत कम है कि अमेरिका ग्रीनलैंड के मुद्दे पर नाटो से बाहर होने की सोच रहा है। उन्होंने कहा, ‘ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर बयानबाजी और नाटो पर दबाव उनकी मोलभाव करने की नीति और रणनीतिक बदलाव का हिस्सा है। डेनमार्क को निशाना बनाकर डोनाल्ड ट्रंप नाटो के अंदर अमेरिकी बादशाहत को स्थापित करना चाहते हैं ताकि यूरोपीय देश रणनीतिक स्वायत्तता का दावा नहीं कर सकें।’
‘जर्मनी-पोलैंड बनाना चाहेंगे परमाणु बम’
डॉक्टर राजकुमार शर्मा ने कहा कि अमेरिका ठीक इसी समय यूरोप को अपने ऊपर निर्भर बनाए रखेगा और उसे एक विरोधी ब्लॉक के रूप में उभरने से रोकेगा। उन्होंने कहा कि ट्रंप के शासनकाल में नाटो के आंतरिक नियम बदलने जा रहे हैं। डॉक्टर शर्मा ने कहा कि अगर अमेरिका नाटो से निकलता है तो यूरोपीय सुरक्षा ढांचा खंड-खंड हो जाएगा। यूरोपीय देश सामूहिक सुरक्षा की जगह पर अपनी-अपनी सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित कर देंगे। उन्होंने कहा कि जर्मनी और पोलैंड जैसे यूरोपीय देश परमाणु बम हासिल करने पर बहस करने लगेंगे। वहीं ब्रिटेन और फ्रांस असलियत में अमेरिका की कमी को पूरा नहीं कर पाएंगे। ये दोनों देश पूरे यूरोप की उस तरह से सुरक्षा नहीं कर पाएंगे जैसे कि अमेरिका करता है।
बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड पर रुख लगभग हर दिन बदलता रहता है, वह कभी बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी देते हैं तो कभी ऐसा न करने का आश्वासन, लेकिन एक बात तय है कि उनका यह दृढ़ विश्वास कि आर्कटिक द्वीप अमेरिका के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। दावोस शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति के भाषण के कुछ ही घंटों के भीतर, ऐसी खबरें प्रकाशित होने लगीं कि वाशिंगटन और कोपेनहेगन ने चुपचाप अमेरिका को नये सैन्य ठिकानों के लिए ग्रीनलैंड के छोटे, दूरस्थ भू-भाग देने पर चर्चा की थी। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हुई, सब अफवाहें थीं, लेकिन जिस तरह से
अमेरिकी सेना ग्रीनलैंड में बेस
जैसे-जैसे वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, यह द्वीप भू-राजनीतिक दबाव का एक मापक बन गया है। इससे पता चलता है कि पुरानी अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था किस तरह कमजोर पड़ने लगी है। इन सभी के केंद्र में पिटुफिक अंतरिक्ष ठिकाना है, जिसे पहले थुले एयरबेस के नाम से जाना जाता था। शीतयुद्ध के दौरान एक चौकी के रूप में इस्तेमाल यह बेस अब अमेरिकी सेना के अंतरिक्ष बल केंद्र का एक अहम हिस्सा है, जो मिसाइल का पता लगाने से लेकर जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने तक हर चीज के लिए आवश्यक है। ग्रीनलैंड में अमेरिकी रुचि उस समय बढ़ रही है, जब युद्ध के बाद की ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ शांति और सुरक्षा बनाए रखने में तेजी से निष्प्रभावी साबित हो रही है।













