जज बोलीं-एक गृहिणी का काम देखभाल तक सीमित नहीं
लाइव लॉ की खबर के अनुसार, जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा-एक गृहिणी का काम केवल देखभाल करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पूरे परिवार के लिए भोजन तैयार करना। किराने का सामान और घरेलू आपूर्ति की खरीद, घर और आसपास की सफाई और रखरखाव, वित्तीय योजना और बजट प्रबंधन, बच्चों की देखभाल और शिक्षा, बुजुर्ग आश्रितों की देखभाल, मरम्मत और घर आधारित स्वास्थ्य देखभाल का समन्वय आदि शामिल हैं।
मोटर दुर्घटना के एक मामले में आया यह फैसला
न्यायाधीश ने कहा कि खुले बाजार में ये सेवाएं उपलब्ध होने पर पर्याप्त पारिश्रमिक प्राप्त होगा, जो परिवार की स्थिरता में गृहिणी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। यह अपील मोटर वाहन अधिनियम , 1988 की धारा 166 के तहत दायर एक दावे की याचिका पर 2016 में सिरसा मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। न्यायाधिकरण ने 8 अक्टूबर 2014 को हुई एक मोटर वाहन दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुई शिल्पा जैन (अब दिवंगत) को 9% प्रति वर्ष की ब्याज दर के साथ 58.22 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
बीमा कंपनी ने मुआवजा कम करने की अपील की थी
दूसरी ओर, बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि मुआवजा पहले से ही बहुत अधिक था और विशेष रूप से भविष्य के चिकित्सा खर्चों के लिए दी गई राशि को मनमाना और अत्यधिक बताते हुए चुनौती दी। यह भी बताया गया कि बीमाकर्ता ने मुआवज़े में कमी की मांग करते हुए एक अलग अपील दायर की थी।
मृतका की अनुमानित आय 15,000 तय की
महंगाई, जीवन यापन की बढ़ती लागत और गृहणियों के आर्थिक मूल्य की न्यायिक मान्यता में हो रहे बदलावों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने मृतक की अनुमानित मासिक आय 15,000 रुपये निर्धारित की। न्यायालय ने यह भी पाया कि पीड़ा एवं कष्ट जैसे गैर-आर्थिक मदों के अंतर्गत दिया गया मुआवजा अपर्याप्त था। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता को सिर में गंभीर चोटें आई थीं, जिनसे उसके सिर में रक्तस्त्राव हो गया था। वह वेंटिलेटरी सपोर्ट पर थीं और दुर्घटना की तारीख से लेकर 21 नवंबर 2017 को अपनी मृत्यु तक पूर्णतः कोमा जैसी स्थिति में थीं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दिखाई राह
केएस. मुरलीधर बनाम आर. सुब्बुलक्ष्मी (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा सहन की गई अत्यधिक शारीरिक और मानसिक पीड़ा को स्वीकार करते हुए, पीड़ा एवं कष्ट के लिए 15 लाख का मुआवजा दिया।













