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  • चीन की कमी भारत से पूरी करेगा जर्मनी, बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारियों के साथ आए हैं मर्ट्ज

    नई दिल्ली: जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ट्ज (Friedrich Merz) भारत की दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार को नई दिल्ली पहुंचे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ जर्मनी के संबंधों को और मजबूत करना है। दोनों देश अमेरिका और चीन जैसे देशों से आर्थिक और भू-राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। भारत और जर्मनी


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    By Azad Hind Desk जनवरी 12, 2026
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    नई दिल्ली: जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ट्ज (Friedrich Merz) भारत की दो दिवसीय यात्रा पर सोमवार को नई दिल्ली पहुंचे। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य भारत के साथ जर्मनी के संबंधों को और मजबूत करना है। दोनों देश अमेरिका और चीन जैसे देशों से आर्थिक और भू-राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं।

    भारत और जर्मनी ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रेडरिक मर्ट्ज की मौजूदगी में कई समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर साइन किए। इससे दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को एक नई ऊर्जा मिली है। एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 50 अरब डॉलर के पार चला गया है, जो अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है। मर्ट्ज के साथ भारत एक बड़ा व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी आया है, जिसमें सीमेंस (Siemens) और एयरबस (Airbus) जैसी कंपनियों के अधिकारी शामिल हैं।
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    ट्रेड डील दोनों के लिए कितनी महत्वपूर्ण?

    यह यात्रा मर्ट्ज के मई में चांसलर बनने के बाद एशिया की पहली यात्रा है। यह यात्रा यूरोपीय संघ (EU) और भारत के बीच होने वाली एक महत्वपूर्ण बैठक से ठीक दो हफ्ते पहले हो रही है। दोनों पक्ष एक लंबे समय से अटके हुए मुक्त व्यापार समझौते (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट- FTA) को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं।

    भारत में 2000 से ज्यादा जर्मन कंपनियां

    पीएम मोदी ने कहा कि भारत में दो हजार से ज्यादा जर्मन कंपनियों की लंबे समय से मौजूदगी है। यह भारत पर उनके अटूट विश्वास और यहां मौजूद अपार अवसरों को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच प्रौद्योगिकी सहयोग सालों से लगातार बढ़ा है और अब यह संयुक्त परियोजनाओं और निवेशों के जरिए जमीनी हकीकत बनता दिख रहा है।

    क्या एफटीए को मिलेगा अंतिम रूप?

    फ्रेडरिक मर्ट्ज ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच एफटीए को अंतिम रूप देने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा समझौता भारत-जर्मनी के आर्थिक संबंधों की पूरी क्षमता को उजागर करने में मदद करेगा। यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापार को और आसान बनाएगा, जिससे ज्यादा से ज्यादा जर्मन कंपनियां भारत में निवेश कर सकेंगी और भारतीय कंपनियां भी यूरोप में अपने व्यापार का विस्तार कर सकेंगी।

    क्यों पनडुब्बियों पर बनेगी बात?

    जर्मनी की कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (Thyssenkrupp Marine Systems) की ओर से भारतीय नौसेना के लिए छह पनडुब्बियां बनाने के संभावित सौदे पर बातचीत जारी है। यह पनडुब्बियां भारत की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (Mazagon Dock Shipbuilders) के साथ मिलकर बनाई जाएंगी। हालांकि, इस सौदे पर यात्रा के दौरान हस्ताक्षर होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि बातचीत से इस मामले में प्रगति हो सकती है। इस सौदे से भारत को अपनी पुरानी रूसी पनडुब्बियों को बदलने में मदद मिलेगी।

    दोनों देशों के बीच कितना व्यापार

    भारत और जर्मनी के बीच द्विपक्षीय व्यापार (bilateral trade) लगभग 50 अरब यूरो (करीब 5.27 लाख करोड़ रुपये) का है। भारत की 1.4 अरब की विशाल आबादी जर्मन निर्यातकों के लिए विकास के बड़े अवसर प्रदान करती है। जर्मनी ट्रेड एंड इन्वेस्ट नामक सरकारी एजेंसी के फ्लोरियन वेंके ने कहा कि जर्मन विदेशी व्यापार विकास के अवसरों वाले बाजारों की तलाश कर रहा है और भारत बिल्कुल वैसा ही बाजार है।

    चीन की कमी भारत से पूरी

    जर्मनी पहले चीन को काफी एक्सपोर्ट करता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में स्थिति बदली है। जर्मनी की चीन में बिक्री कम हो गई है। वहीं जर्मन कंपनियों को विभिन्न उद्योगों में चीनी प्रतिद्वंद्वियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। बर्लिन और बीजिंग के बीच संबंध भी तनावपूर्ण हो गए हैं, क्योंकि चीन ने सेमीकंडक्टर और कुछ दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (rare earth elements) की आपूर्ति बैन लगा दिया है। ऐसे में जर्मनी के लिए अब भारत महत्वपूर्ण बन गया है।

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