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  • चीन पर रहम, भारत पर सितम… टैरिफ को लेकर अमेरिका का रवैया अलग-अलग क्यों?

    नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस को लेकर एक बिल पर सहमति जताई है। इस बिल के अनुसार अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है। इसमें भारत, चीन और ब्राजील शामिल हैं। इस खबर के बाद भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को


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    By Azad Hind Desk जनवरी 9, 2026
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    नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस को लेकर एक बिल पर सहमति जताई है। इस बिल के अनुसार अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है। इसमें भारत, चीन और ब्राजील शामिल हैं। इस खबर के बाद भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली। माना जा रहा है कि अगर 500 टैरिफ लगता है तो भारत के लिए अमेरिका को चीजें एक्सपोर्ट करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

    इस बिल के सामने आने के बाद माना जा रहा है कि इसका सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ेगा, क्योंकि अमेरिका चीन को इससे राहत दे सकता है। अमेरिका चीन के साथ ऐसा पहले भी कर चुका है। दरअसल, अमेरिका का भारत और चीन के प्रति रवैया बिल्कुल अलग है। अमेरिका चीन के प्रति नरमी बरत रहा है, जबकि भारत पर सख्ती दिखा रहा है।
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    चीन पर नरम क्यों है अमेरिका?

    अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से 36 का आंकड़ा रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव भी देखने को मिलता रहता है। इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन चीन के साथ सावधानी से पेश आ रहा है। इसका एक बड़ा कारण चीन का दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (rare earth minerals) पर दबदबा है। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों के लिए बहुत जरूरी हैं।

    भले ही चीन रूस तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन उस पर अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया गया है। ट्रंप ने पिछले साल 12 अगस्त को चीनी आयात पर नए शुल्क स्थगित कर दिए थे। उन्होंने टैरिफ को 30% पर बनाए रखा, जो भारतीय सामानों पर लगाए गए 50% टैरिफ से काफी कम है।

    चीन दिखा चुका है अपना रंग

    चीन ने भी अमेरिका के प्रति सख्त रवैया अपनाया है। चीन ने अमेरिका को दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और चुम्बकों के निर्यात पर लाइसेंस प्रतिबंध लगा दिए थे। इससे अमेरिकी उद्योगों, खासकर ऑटो निर्माताओं और प्रौद्योगिकी कंपनियों में हड़कंप मच गया था। ये क्षेत्र चीनी आपूर्ति पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं। आपूर्ति में थोड़ी सी भी रुकावट उत्पादन में देरी और सप्लाई चेन में गड़बड़ पैदा कर सकती है।

    घरेलू निर्माताओं के दबाव में अमेरिका को बातचीत का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। दुर्लभ पृथ्वी खनिजों को लेकर हुए इस गतिरोध ने दिखाया कि चीन किस तरह से जवाबी कार्रवाई कर सकता है, जिससे अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है। इसलिए चीन के खिलाफ सख्त टैरिफ रणनीति अपनाना अमेरिका के लिए एक जोखिम भरा कदम है।

    भारत पर ट्रंप की सख्ती क्यों?

    चीन के विपरीत अमेरिका भारत पर सख्ती अपनाता रहा है। दरअसल, भारत के पास चीन जैसी रणनीतिक ताकत नहीं है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूस से रियायती दर पर तेल खरीदने वाला एक प्रमुख देश बन गया है। लेकिन, भारत के पास चीन जैसी महत्वपूर्ण सप्लाई चेन पर नियंत्रण की शक्ति नहीं है। ट्रंप ने बार-बार भारत की व्यापार नीतियों पर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने भारत पर अमेरिकी सामानों पर ऊंचे टैरिफ और बाधाएं लगाने का आरोप लगाया है।

    भारत पर कुल 50% टैरिफ इसलिए लगाए गए हैं क्योंकि भारत रूस से काफी मात्रा में तेल खरीद रहा है। अमेरिका का मानना है कि इससे यूक्रेन संघर्ष के बीच रूस की अर्थव्यवस्था को मदद मिल रही है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर भारत रूसी तेल के मुद्दे पर मदद नहीं करता है तो अमेरिका टैरिफ और बढ़ा सकता है। उन्होंने इस दबाव को सीधे तौर पर रूस-यूक्रेन युद्ध से जोड़ा। यह टैरिफ बढ़कर 500 फीसदी तक हो सकता है।

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