SC की हलिया टिप्पणियां
- 19 फरवरी 2026 को चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा था कि किसी राज्य का राजस्व सरप्लस भी है, तो क्या उसका दायित्व यह नहीं है कि वह धनराशि सड़कों, अस्पतालों और स्कूलों के विकास पर खर्च करें। सभी राजनीतिक दल और नेता इस पर पुनर्विचार करें।
- 12 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोग अब काम करने के इच्छुक नहीं है क्योंकि उन्हें मुफ्त राशन और धनराशि मिल रही है।
- 3 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया था कि वह सोच रहा है कि इसके लिए एक एक्सपर्ट बॉडी बनाई जाए, जो अपना सुझाव दे सके। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि कोई भी दल इस बारे में बात नहीं करती है, क्योंकि सभी मुफ्त उपहार ऑफर करना चाहते हैं।
- 11 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा था कि कोई यह नहीं कह सकता है कि यह गंभीर विषय नहीं है। जो लोग मुफ्त उपहार बांटने के खिलाफ है, उनका यह अधिकार है, क्योंकि वह टैक्स देते हैं। इस विषय पर बहस जरूरी है।
अर्जी भी हो चुकी है खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था, जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव, 2025 नए सिरे से कराने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को मौखिक टिप्पणी में कहा था कि आपकी पार्टी को कितने वोट मिले ? अगर जनता ने आपको नकार दिया है, तो फिर आप लोकप्रियता पाने के लिए न्यायिक मंच का सहारा ले रहे हैं।
क्या है मामला?
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर रिट याचिका में पार्टी ने उस समय राज्य की महिला मतदाताओं को 10 हजार रुपये ट्रांसफर करने को चुनौती दी थी। कहा था कि जब आचार संहिता लागू रहते कैश ट्रांसफर किया गया। 17 अगस्त 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुफ्त उपहार का मामला जटिल होता जा रहा है। क्या मुफ्त शिक्षा और मुफ्त पानी मुफ्त उपहार की श्रेणी में है? तत्कालीन चीफ जस्टिस ने कहा था कि जो मुद्दे उठाए गए हैं, उनसे कुछ अहम सवाल उठते हैं कि क्या मुफ्त उपहार है और क्या नहीं है?
2022 वाली याचिका में क्या है मांग ?
‘फ्रीबीज’ के खिलाफ SC में 4 साल पहले दाखिल अर्जी में याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था। कोर्ट ने 25 जनवरी 2022 को केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। सुनवाई के लिए एडवोकेट उपाध्याय कई बार केस को मेशन किया। हाल ही मे CJI सूर्यकात की अगुवाई वाली बेच के सामने भी मामला उठा और जल्द सूचीबद्ध करने का आग्रह किया गया।
मामले की अगली सुनवाई
SC ने कहा कि वह मार्च में सुनवाई करेगा। उपाध्याय ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में सुब्रह्मण्यम बालाजी बनाम तामिलनाडु राज्य मामले में जो फैसला दिया था, उस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। तब कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राजनीतिक पार्टियां चुनावी घोषणा पत्र में जो वादे करती है, वह करप्ट प्रैक्टिस नहीं है।













