पॉक्सो केस में बेल पर फैसला पलटा
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जमानत के एक आदेश को पलट दिया। इस केस में आरोपी पर एक नाबालिग बच्ची से रेप और सेक्सुअल असॉल्ट का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हाई कोर्ट का आदेश विकृत और अनुचित है, और साथ ही इसमें जरूरी बातों को नजरअंदाज किया गया है।
अपराध की प्रकृति,गंभीरता देखना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर कहा, ‘यह एक स्थापित कानून है कि सिर्फ चार्जशीट दायर होने का मतलब ये नहीं है कि बेल याचिका पर विचार के लिए इतना ही काफी है। ऐसी याचिका पर विचार करते समय कोर्ट की यह ड्यूटी है कि वह अपराध की प्रकृति,उसकी गंभीरता और जांच के दौरान जुटाए गए मटेरियल पर भी पूरा घ्यान दे।’
सामाजिक चेतना झकझोरने वाला अपराध
जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस महादेवन की बेंच ने आगे कहा कि ‘मौजूदा मामले में अपराध के आरोप जघन्य और गंभीर हैं, जिसमें एक नाबालिग पीड़िता को हथियार दिखाकर और धमका कर बार-बार सेक्सुअल असॉल्ट किया गया और ब्लैकमेल करने के इरादे से इन हरकतों की रिकॉर्डिंग भी की गई। ऐसा व्यवहार पीड़िता के जीवन पर बहुत बुरा असर डालता है और यह समाज की सामूहिक चेतना को भी झकझोर देता है।’
‘बेल के ऐसे मामलों में दखल देना जरूरी’
इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए जस्टिस महादेवन ने अपने फैसले में लिखा है, ‘हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देते समय, अपराधों की प्रकृति और गंभीरता और पीओसीएसओ एक्ट के प्रावधानों के तहत वैधानिक सख्ती पर ध्यान नहीं दिया।’ अदालत ने कहा कि ‘जरूरी चीजों पर ठीक से बिचार किए बिना ही दी गई जमानत में दखल देना जरूरी है।’
क्या है पॉक्सो केस में जमानत का केस
इस मामले में पुलिस के मुताबिक आरोपी नाबालिग पीड़िता को जानता था। उसने अपने दोस्तों के साथ नाबालिग के साथ 6 महीने से ज्यादा समय तक सेक्सुअल असॉल्ट किया। कथित रूप से यह वारदात कट्टा दिखाकर होता रहा और मोबाइल फोन पर ब्लैकमेल के इरादे से पीड़िता की रिकॉर्डिंग भी कर ली गई। पुलिस ने शुरू में आनाकानी के बाद 2 दिसंबर, 2024 को एफआईआर दर्ज की। जब आरोपी को सेशन कोर्ट से जमानत नहीं मिली, तो वह इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। यहां से अप्रैल 2025 में उसे जमानत मिल गई, जिसके खिलाफ पीड़िता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। उसने यह भी आरोप लगाया कि जेल से निकलने के बाद वह उसे धमका रहा है।
उमर खालिद, शरजील इमाम को बेल नहीं
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के दो कुख्यात आरोपियों उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से मना कर दिया, क्योंकि अदालत ने कहा कि इनके खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत साजिश से जुड़े मामले में पहली नजर में केस बनता है। जबकि, इसी मामले में अदालत ने पांच अन्य आरोपियों-गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, सलीम खान और शादाब अहमद को बेल दे दी।
‘जमानत नियम है, जेल अपवाद है’
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट लगातार इस सिद्धांत का पालन करता रहा है कि ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद है’ (bail is the rule,jail an exception)। लेकिन, जब देश की सर्वोच्च अदालत को लगा कि इस तरह से जमानत को सामान्य बना दिया जाएगा, तो यौन हमलों के गंभीर अपराधियों और देश के खिलाफ साजिश रचने वाले आतंकवादियों को फायदा मिल सकता है तो लगता है कि उसने में अपने नजरिए में थोड़ा बदलाव करने शुरू किया है।














