सुभाष घई ने IANS से कहा कि ये मुद्दा समाज में कई सालों से बना हुआ है। जो लोग अपने काम पर ध्यान देना चाहते हैं, वे ऐसी चर्चाओं से प्रभावित नहीं होते हैं। उनसे पूछा गया, ‘फिल्म इंडस्ट्री को आमतौर पर एक प्रगतिशील क्षेत्र माना जाता है, लेकिन फिर भी कभी-कभी सांप्रदायिक भावनाओं की चर्चा होती है। तो आपको क्या लगता है कि क्या ये इंडस्ट्री समाज की इन दरारों से पूरी तरह अछूता है?’
‘ये समस्या हमेशा से थी’
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘देखिए, मेरा जन्म नागपुर में हुआ था। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा दिल्ली में की। हम चांदनी चौक में रहते थे। ये समस्या तब भी थी, जब मैं 8वीं क्लास में था। कॉलेज जाने पर भी ये समस्या बनी रही और मुंबई आने पर भी ये समस्या मौजूद थी।’
‘आने वाले सालों में भी जारी रहेगा’
वो आगे कहते हैं, ‘सांप्रदायिक सद्भाव का मुद्दा हमेशा चर्चा में रहेगा। सांप्रदायिक अशांति, सांप्रदायिक उपद्रव और बेरोजगारी पर पिछले कई साल से चर्चा होती रही है और आने वाले सालों में भी इस पर चर्चा जारी रहेगी।’
‘जो राजनीति करना चाहते हैं, वो यही कर रहे हैं’
सुभाष ने ये भी कहा कि उनके बयान का अनावश्यक अर्थ निकालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वो कहते हैं, ‘किसी के एक बयान का अर्थ समझने की कोशिश करके इसे बड़ा मुद्दा ना बनाएं। जो लोग अपने काम में माहिर होते हैं, वे अप्रभावित रहते हैं और अपने काम पर फोकस करते हैं। जो लोग राजनीति करना चाहते हैं, वे बस यही कर रहे हैं।’
एआर रहमान ने क्या कहा था?
एआर रहमान हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को लेकर कहा था, ‘आजकल जो लोग क्रिएटिव नहीं हैं, उनके पास फैसले लेने की पावर है। और ये शायद सांप्रदायिक मुद्दा भी रहा है, लेकिन मेरे सामने नहीं।’













