यूएन में ईरान के साथ डटा भारत
भारत का ईरान में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। जिसमें चाबहार बंदरगाह की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है। यह सिर्फ भारत के विश्व व्यापार के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के हित भी यहां से जुड़े हुए हैं। इस समय वहां पर जो जियोपॉलिटिकल तनाव पैदा हुए हैं, इसने भारत की चिंता बहुत बढ़ा रखी है। यही वजह है यूनाइटेड नेशन ह्यूमैन राइट्स काउंसिल के ईरान के खिलाफ प्रस्ताव के विरोध में भारत ने वोट डाला। भारत के साथ ऐसा करने वालों में चीन, क्यूबा और वियतनाम जैसे देश ही शामिल थे। जबकि, 14 देश इसपर हुए वोटिंग में शामिल नहीं हुए। भारत के पास भी यह विकल्फ था, लेकिन, भारत ने प्रस्ताव का समर्थन करने वाले 25 देशों की राय के खिलाफ जाना बेहतर समझा।
ईरान दे रहा पुराने रिश्ते का वास्ता
भारत और ईरान का रिश्ता ईरान और इस्लाम के इतिहास से भी पुराना है। ये बात हाल ही में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के प्रतिनिधि अब्दुल माजिद हकीम इलाही ने भी दोहराई है। एएनआई के अनुसार उन्होंने कहा, ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के सुप्रीम लीडर भारत और ईरान में हमेशा अच्छे संबंधों और तालमेल पर जोर देते हैं।…मुझे उम्मीद है कि चाबहार में वे अच्छा काम करेंगे…ईरान और भारत के बीच रिश्ता और तालमेल का इतिहास 3,000 साल पुराना है, जब ईस्लाम आया भी नहीं था। उस समय भी हम भारत के दार्शनिक किताब इस्तेमाल करते थे।’
ईरान में अस्थिरता भारत की चिंता
जहां तक भारत कि बात है तो इसने ईरान को कभी वैचारिक सहयोगी नहीं माना है। जो संबंध तैयार हुए हैं, वह जरूरत आधारित हैं। पाकिस्तान की वजह से भारत का अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बाधित हो जाता है। ऐसे में ईरान ही एकमात्र रास्ता बचता है। यही नहीं, पाकिस्तान की भारत-विरोधी नीति में ईरान एक ऐसा देश बनकर उभरा है, जो समय-समय पर हमारी नीति के काम आते रहा है या बैंलेस बिठाने का काम करता है। इसलिए ईरान में अस्थिरता भारत के न तो सुरक्षा हित में है और न ही व्यापारिक।
चाबहार पोर्ट की अहमियत बढ़ चुकी है
दुनिया के नक्शे पर जहां ईरान है, वह भारत के लिए सामरिक तौर आवश्यक आवश्यकता बन गया है। दशकों से ईरान भारत के लिए अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया का गेटवे रहा है, इसी लॉजिक ने चाबहार पोर्ट की कल्पना को आकार दिया। समय के साथ यह भी साबित हुआ है कि चाबहार पोर्ट अब भारत के लिए सिर्फ बंदरगाह नहीं है। इसके मायने इससे कहीं ज्यादा हो चुके हैं। अगर ईरान कमजोर पड़ा तो पाकिस्तान को सीधा फायदा होगा और यह भारत के लिए अच्छी सूरत नहीं है। यही नहीं, कूटनीतिक तौर पर ईरान ने आमतौर पर भारत का साथ दिया है और भारत इस वजह से उसे खत्म होते नहीं देखना चाहता। कश्मीर के मसले पर भी तेहरान भारत का साथ देता है। ईरान में अगर सत्ता परिवर्तन हुआ तो भारत को ये सबकुछ सहजता से उपलब्ध होता रहेगा, इसकी गारंटी कौन देगा।
ईरान में हालात बिगड़ना, भारत की असुरक्षा
इन्हीं सब चिंताओं को देखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने अपने डिप्टी को खास तौर पर ईरान भेजा । क्योंकि, ईरान से भारत के जो सुरक्षा हित जुड़े हुए हैं, उसपर अपने सहयोगी को साथ लेकर चलना समय की मांग है। ईरान में हालात और ज्यादा बिगड़े तो भारत के सामने कई तरह के संकट खड़े होने शुरू हो सकते हैं।













