मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बरकरार
लाइवलॉ के मुताबिक मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ एम इमाम हुसैन नाम के शख्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने से मना कर दिया। हाई कोर्ट ने अक्टूबर, 2025 के अपने फैसले में यह भी कहा था कि क्षेत्र में जानवरों की कुर्बानी देने की भी अनुमति नहीं दी जा सकती।
मुस्लिमों की दलील सुप्रीम कोर्ट से खारिज
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को यह समझाने की कोशिश की इलाके में कानून और व्यवस्था की समस्या कभी नहीं रही है। उन्होंने कहा, ‘नमाज सिर्फ रमजान और बकरीद के दिन ही हो सकती है, हमारी आपत्ति सिर्फ इस शब्द से है। प्रिवी काउंसिल और ट्रायल कोर्ट के फैसलों से यह साफ है कि नेल्लीथप्पू क्षेत्र की 33 सेंट जमीन मुसलमानों की है। मद्रास हाई कोर्ट इस बात को मानता है, फिर भी नमाज सिर्फ दो त्योहारों तक सीमित की गई। बाकी शर्तें लगाई जा सकती हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हम तैयार है, यह कभी कोई समस्या नहीं रही।’
‘यह बहुत ही बैलेंस ऑर्डर नजर आता है’
जस्टिस अरविंद कुमार ने प्रशांत भूषण की दलील पर कहा कि अगर कानून और व्यवस्था का मुद्दा नहीं होता, तो शांति समितियों की बैठकें भी नहीं होतीं। जस्टिस कुमार और जस्टिस वराले ने हाई कोर्ट के आदेश से सहमति जताते हुए कहा कि ‘यह बहुत ही बैलेंस ऑर्डर नजर आता है।’ उन्होंने कहा, ‘हमारा इस आदेश में दखल देने का इरादा नहीं है। पार्टियों के अधिकारों पर कोई राय जाहिर किए बिना विवादित आदेश को बरकरार रखा जाता है।’
तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी विवाद क्या है
तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर सिक्कंदर बादशाह अवुलिया दरगाह के अलावा अरुलमिघु सुब्रमण्यस्वामी थिरुकोविल मंदिर और काशी विश्वनाथन मंदिर भी है। यहां पर नमाज और कुर्बानी विवाद की वजह रही है। जून, 2025 में हाई कोर्ट के दो जजों ने विभाजित निर्णय दिया था। जस्टिस निशा बानू ने कुर्बानी में दखल देने से इनकार कर दिया, लेकिन जस्टिस एस श्रीमथी ने कहा कि दरगाह को कुर्बानी, रमजान, बकरीद और अन्य मुस्लिम त्योहारों पर नमाज के लिए सिविल कोर्ट में जाना चाहिए। यही नहीं, जस्टिस बानू ने मुसलमानों के अधिकारों को कायम रखा, जबकि जस्टिस श्रीमथी ने पाया कि नेल्लीथप्पू में नमाज हाल की ही शुरुआत है। उन्होंने यह भी कहा कि नमाज के लिए ज्यादा तादाद में लोग जुटे तो पास के अरुलमिगु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के हिस्से में अतिक्रमण होगा, जिससे काशी विश्वनाथ मंदिर के रास्ते में रुकावट आएगी।
कार्तिगई दीपम की भी मिली अनुमति
इस विभाजित फैसले के बाद मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस मामले में अंतिम निर्णय के लिए इसे एक अन्य जज की अदालत में भेज दिया। 10 अक्टूबर, 2025 को अपने फैसले में तीसरे जज ने भी कहा कि मुस्लिम श्रद्धालुओं के नमाज का अधिकार सिर्फ रमजान और बकरीद तक ही सीमित रहेगा। यही नहीं, जबतक कोई सक्षम सिविल कोर्ट इस पहाड़ी पर पशु बलि पर फैसला नहीं कर लेती, यहां पर कुर्बानी, नॉन-वेज खाना बनाने, लाने, परोसने की अनुमति नहीं रहेगी। इन्हीं दोनों आदेशों को संविधान के अनुच्छेद 25 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया था। इससे पहले पिछले साल दिसंबर में मद्रास हाई कोर्ट ने दरगाह के पास कार्तिगई दीपम पर प्रकाश प्रज्वलित करने की अनुमति दे दी थी। हाई कोर्ट ने इस मामले में उसके आदेश के पालन में कोताही के लिए राज्य सरकार को मानहानि को लेकर भी फटकार लगाई है।













