चार साल पहले यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद इंटरनेशनल गैस ट्रेड में भारी उथलपुथल देखने को मिली थी। रूस दुनिया में गैस का सबसे बड़ा सप्लायर है। तब यूरोप में गैस की कीमत आसमान पर पहुंच गई थी क्योंकि यह रूस का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट मार्केट था। इस बार सबसे ज्यादा खतरा एशियाई देशों को है। पिछले साल कतर ने जितनी गैस बेची थी, उसका करीब 20 फीसदी एशियाई देशों ने खरीदा था। कतर की गैस खरीदने में चीन पहले और भारत दूसरे नंबर पर है। चीन की एक तिहाई गैस कतर से आती है।
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कौन खरीदता है कतर से गैस?
कतर ने पिछले साल 82.2 मिलियन टन गैस का एक्सपोर्ट किया था। इस दौरान चीन ने कतर से 20 मिलियन टन एलएनजी खरीदी थी जबकि भारत ने 12 मिलियन टन गैस खरीदी थी। इस दौरान ताइवान ने 8 मिलियन टन, पाकिस्तान और साउथ कोरिया ने 7-7 मिलियन टन गैस कतर से खरीदी थी। अन्य देशों ने 29 मिलियन टन गैस कतर से खरीदी थी। शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक कम से कम 11 एलएनजी टैंकर ने अपनी यात्रा रोक दी है। कतर के साथ-साथ यूएई भी होर्मुज की खाड़ी से एलएनजी एक्सपोर्ट करता है।
जानकारों का कहना है कि कतर की गैस का कोई विकल्प नहीं है। खासकर एशिया के देशों के लिए कोई रिप्लेसमेंट नहीं है। अगर ईरान और इजरायल का यह संघर्ष लंबा खिंचता है और शिपिंग में दिक्कत आती है तो एलएनजी की कीमत में काफी तेजी आ सकती है। चीन के आयातकों ने पहले से ही विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं। हालांकि QatarEnergy ने अब तक कोई शिपमेंट नहीं रोका है।
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तुर्की की परेशानी
भारत, जापान और दूसरे देशों में ट्रेडर्स की कीमतें बढ़ने की आशंका है और वे इसके लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। पिछले एक साल से पर्याप्त सप्लाई के कारण एलएनजी की कीमत में ज्यादा तेजी नहीं आई। एलएनजी के कॉन्ट्रैक्ट अमूमन क्रूड बेंचमार्क से जुड़े होते हैं। ऐसे में ब्रेंट की कीमत में तेजी से गैस की कीमत बढ़ सकती है। तुर्की की भी परेशानी बढ़ सकती है जो ईरान से पाइपलाइन के जरिए गैस मंगाता है। तुर्की की कुल सप्लाई में ईरान की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी है।













